कविता
हम इस दुनिया में खुदका अक्ष ढूंढते रहते हैं
मिलती हैं बस खाक
लालच भरी इस दुनिया में करे कैसे किसी पर यकीन
सारे सौदे , दगे- ये मिलता दुनिया से
हम इस दुनिया में सुकून ढूंढते नजर आते हैं
मिलता सिर्फ दुःख दर्द हैं यहां
दुनिया के इस आलम में न कोई अपना हैं न कोई पराया
वक्त आने पर सबके चेहरे सामने आ जाते
इस खूबसूरत दुनिया में रहा न किसी का दिल खूबसूरत
देखो तो सब अपने हैं जानो तो सब पराए
हम इस दुनिया में खुदका अक्ष ढूंढते नजर आते है
मिलती हैं बस खाक…
— गंगा मांझी
