इतिहास

आशा भोंसले : मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है

भारतीय संगीत के फलक पर सात दशकों तक अपनी आवाज़ की जादूगरी बिखेरने वाली सुरों की मलिका, आशा भोंसले (आशा ताई) का आज 92 वर्ष की आयु में महाप्रयाण हो गया। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनके अंतिम सांस लेने के साथ ही भारतीय पार्श्व गायन  के उस स्वर्ण युग का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया, जिसने पीढ़ियों को गुनगुनाना सिखाया। उनका निधन केवल एक महान कलाकार की विदाई नहीं है, बल्कि उस अदम्य जिजीविषा और प्रयोगधर्मी साहस का विराम है, जिसने संगीत को नई परिभाषाएँ दीं।

आशा जी की जीवन यात्रा संघर्ष और स्वाभिमान की मिसाल रही है। एक ऐसे समय में जब ‘सुर कोकिला’ लता मंगेशकर का प्रभाव शिखर पर था, आशा भोंसले ने अपनी एक नितांत मौलिक और स्वतंत्र पहचान गढ़ी। उन्होंने कभी भी ख़ुद को किसी की परछाईं नहीं बनने दिया। शुरुआती दौर में उन्हें वे गीत मिले जो दूसरों द्वारा ठुकरा दिए गए थे, लेकिन अपनी मेहनत और आवाज़ से उन्होंने साबित किया कि वह हर भाव को स्वर देने में सक्षम हैं। शास्त्रीय नज़ाकत वाली ग़ज़लों से लेकर कैबरे की थिरकन और लोक धुनों की सोंधी महक तक, उनकी आवाज़ ने हर शैली को अपना बना लिया।

आशा ताई की उपलब्धियाँ भारतीय संगीत की वह अनमोल धरोहर हैं, जिसे काल के बंधनों में नहीं बांधा जा सकता। 12,000 से अधिक गीतों को स्वर देने का उनका गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड उनकी अटूट सक्रियता का प्रमाण है। उन्हें दादा साहब फाल्के  और पद्म विभूषण  जैसे शीर्ष सम्मानों से नवाज़ा गया,  आर.डी. बर्मन (पंचम दा) के साथ उनकी सांगीतिक जुगलबंदी ने ‘दम मारो दम’ और ‘चुरा लिया है’ जैसे कालजयी गीत दिए, जो आज भी संगीत प्रेमियों की धड़कन बने हुए हैं। वो संवेदना और जीवंतता का संगम थीं,

संगीत के साथ-साथ आशा जी का व्यक्तित्व भी अत्यंत जीवंत और प्रेरक था। जीवन के व्यक्तिगत दुखों और उतार-चढ़ाव के बावजूद उनकी ख़नकती आवाज़ और चेहरे की मुस्कान कभी फ़ीकी नहीं पड़ी। उन्होंने अपनी गायकी में सूक्ष्म बारीकियों का ऐसा संसार रचा कि ‘इन आँखों की मस्ती के’ जैसी ग़ज़लें सुनकर रूह झूम उठती है। वे केवल एक गायिका नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती संस्था थीं, जिन्होंने भाषा और भूगोल की सीमाओं को लांघकर दुनिया भर में भारतीय संस्कृति का परचम फ़हराया।

आज भले ही वह भौतिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, परंतु उनकी विरासत एक ऐसी अक्षय निधि की तरह हमारे पास सुरक्षित है, जो आने वाली कई शताब्दियों तक संगीत के साधकों का मार्गदर्शन करती रहेगी। 13 अप्रैल  होने वाला उनका अंतिम संस्कार एक देह का अंत हो सकता है, लेकिन उनकी ‘मखमली आवाज़’ फिज़ाओं में हमेशा के लिए अमर हो चुकी है। जैसा कि अक्सर उनके चाहने वाले कहते हैं, “सूरज ढल सकता है, लेकिन उसकी रोशनी रह जाती है।”आशा ताई की आवाज़ वह शाश्वत रोशनी है जो संगीत की दुनिया को हमेशा आलोकित करती रहेगी।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़  

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

Leave a Reply