लघुकथा – जहाँ दीवारें नहीं, दिल दरकते हैं
पुराना घर था… मिट्टी की वही सौंधी महक, आँगन में खड़ा नीम का पेड़, और बरसों से साथ निभाती दीवारें। पर आज उन दीवारों में एक बारीक-सी दरार उभर आई थी—जैसे समय ने चुपके से कोई निशान छोड़ दिया हो।
राधा ने उँगलियों से उस दरार को छुआ…मानो किसी पुराने ज़ख्म की टीस टटोल रही हो। “ये दीवार भी अब थक गई है…” उसने धीमे से कहा।
पास खड़े उसके छोटे बेटे नील ने मासूमियत से पूछा— “माँ, इसे ठीक क्यों नहीं करवा लेते?”
राधा हल्के से मुस्कुराई, पर उसकी आँखें कहीं दूर अतीत में खो गईं। कभी इसी दीवार के सहारे खड़े होकर उसने और उसके पति ने इस घर के सपने बुने थे। हर ईंट में उम्मीदें थीं, हर कोने में हँसी की गूँज बसती थी। पर वक्त के साथ… बातें कम होती गईं, खामोशियाँ बढ़ती गईं, और छोटी-छोटी शिकायतें—अनदेखी दरारों में बदलती चली गईं। एक दिन वो भी चले गए… बिना कुछ कहे। धीरे-धीरे, इस दीवार की तरह— रिश्ते भी दरक गए।
“माँ, ये गिर तो नहीं जाएगी ना?” नील की आवाज़ ने उसे वर्तमान में लौटा दिया।
राधा ने धीरे से दरार पर हाथ फेरते हुए कहा— “नहीं बेटा… अगर समय रहते संभाल लिया जाए, तो कोई भी दीवार गिरती नहीं।”
उस क्षण जैसे उसने खुद से ही कोई बात कही हो। एक संकल्प लिया— इस बार वह सिर्फ दीवार ही नहीं, उन रिश्तों को भी सँभालेगी, जो अनकहे दर्द के बोझ तले चुपचाप दरक रहे हैं। दीवारों में पड़ने वाली दरारें तो दिखाई दे जाती हैं, पर दिलों में उभरती दरारें अक्सर खामोश रहती हैं… राधा ने एक बार फिर उस दरार को छुआ— पर इस बार उसकी उँगलियाँ काँपी नहीं। उसने नील का हाथ थामा और भीतर चली गई। बाहर दीवार वैसी ही खड़ी थी—दरकी हुई…पर पहली बार, घर के भीतर कुछ टूटने से बच गया था।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
