कहानी

आख़िरी सबक़

​हवाओं में नमी थी और फ़िज़ा में पुरानी किताबों की वह सोंधी सी महक बसी थी जो केवल बरसों पुरानी लाइब्रेरी की दीवारों से आती है। शहर के उस पुराने स्कूल की इमारत, जिसकी ईंटें वक़्त की गर्द से धुंधला गई थीं, आज एक अजीब से सन्नाटे में डूबी थी। शाम के साये गहरी स्याही की तरह कागज़ पर फैल रहे थे।
​लाइब्रेरी के सुदूर कोने वाली मेज पर सरफराज़ साहब झुके हुए थे। कुछ सफ़ेद, कुछ स्याह बाल मानो उनके माथे पर चांदी और रात की सरहदें मिल रही हों उनके चेहरे पर गिर रहे थे। हाथ में थमा क़लम कागज़ पर किसी गज़ल की काट-छाँट में मग्न था। सरफराज़ केवल एक उस्ताद नहीं थे, वह उर्दू अदब का वह रोशन चिराग़ थे जिसकी लौ से शहर के कई नौजवानों के ज़हन रौशन हुए थे।​तभी चौखट पर एक साया उभरा। मिस ज़ोया दाख़िल हुईं। उनका वक़ार और नफ़ासत पूरे स्कूल में मिसाल थी। वह जब बोलती थीं तो लगता था जैसे ख़ामोश झील में कंकड़ गिरा हो,शफ़्फ़ाक़ और सुरीली आवाज़। मगर उस शाम उनकी आँखों में एक अजीब सी बेक़रारी का तूफ़ान था।​”सरफराज़ साहब! चिरागों के जलने का वक़्त हो गया और आप अभी तक इन बुझे हुए अलफ़ाज़ में उलझे हैं?” ज़ोया की आवाज़ में वह अपनापन था जो अक्सर लहज़ों की सरहदों को पार कर रूह को छू लेता है।
​सरफराज़ ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और एक थकी हुई मगर पुरसुकून मुस्कुराहट के साथ कहा, “ज़ोया साहिबा, कुछ अधूरे लफ़्ज़ों की तरतीब बाक़ी थी। सोच रहा हूँ, इंसान की उम्र तमाम हो जाती है पर लफ़्ज़ कभी मुकम्मल नहीं होते। हम सब उम्र भर बस एक मुकम्मल जुमले की तलाश में रहते हैं।”
​ज़ोया उनके करीब आईं। उनके दिल में एक बरसों पुरानी हसरत दफ़्न थी,एक ऐसी मोहब्बत जो तहज़ीब के रेशमी परदों में लिपटी हुई थी। तभी अचानक सीढ़ियों पर तेज़ क़दमों की चाप सुनाई दी और आइज़ा अंदर दाखिल हुई।
​वह स्कूल की सबसे ज़हीन और जज़्बाती छात्रा थी। आइज़ा की आँखों में वह ‘वहशत’ थी जिसे ज़ोया जैसी तजुर्बेकार शख्सि़यत एक पल में पहचान सकती थी। आइज़ा का जोश उसे बाग़ी बना रहा था। वह सरफराज़ साहब के इल्म की नहीं, उनके वजूद के आभामंडल की दीवानी हो चुकी थी।
​”सर! क्या आप मेरी ये नोटबुक देख लेंगे?” आइज़ा की आवाज़ में एक थरथराहट थी, मगर उसकी नज़रें सीधे सरफराज़ के चेहरे पर जमी थीं,एक ऐसी साफ़गोई जो जवानी की पहली दहलीज़ पर अक्सर गुस्ताख़ी बन जाती है।​ज़ोया का चेहरा तपते कुंदन जैसा हो गया। एक उस्ताद के तौर पर उन्हें यह ‘अदब की कमी’ लगी, मगर एक ख़ातून के तौर पर उन्हें अपनी मुक़द्दस ज़मीन पर किसी दूसरे की दस्तक का ख़ौफ़ महसूस हुआ।
​”आइज़ा, सूरज ढल चुका है। क्या ये इल्म कल की रोशनी का इंतज़ार नहीं कर सकता?” ज़ोया ने सर्द लहज़े में कहा।
​आइज़ा ने नज़रें नहीं झुकाईं। “जी मैम, मगर सर ने ही तो सिखाया है कि अदब में वक़्त की घड़ियाँ नहीं, जज़्बों की शिद्दत देखी जाती है।”
​सरफराज़ साहब इस खामोश जंग से बेख़बर नहीं थे। वह जानते थे कि एक तरफ़ वह वफ़ा है जिसने बरसों ख़ामोशी का ज़हर पिया, और दूसरी तरफ़ वह जुनून है जो अभी तजुर्बे की आंच में तपा नहीं था। उन्होंने नरमी से कहा, “ठीक है आइज़ा, बैठो। ज़ोया साहिबा, आप परेशान न हों, बस दस मिनट का एक आख़िरी सबक़ है।”
​उस शाम उस छोटे से कमरे में तीन दिल धड़क रहे थे। सरफराज़ मीर तक़ी मीर का वह मशहूर शेर समझा रहे थे,
​पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है…
​आइज़ा ने बीच में ही बात काट दी, “सर! क्या यह मुमकिन है कि कोई सब कुछ जानकर भी अनजान बना रहे? क्या ख़ामोश रहना सज़ा नहीं है?”
​सरफराज़ का क़लम रुक गया। उन्होंने खिड़की के बाहर फ़ैलते अंधेरे को देखा और धीमे से बोले, “आइज़ा, कभी-कभी अनजान बने रहना रिश्तों का भ्रम रखने के लिए ज़रूरी होता है। हर सच को ज़बान देना ज़रूरी नहीं, कुछ सच सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं ताकि ताल्लुक़ का वक़ार बना रहे।”
​वक़्त बीता और यह त्रिकोण एक तमाशा बनने की कगार पर आ गया। स्कूल के सालाना जलसे (एनुअल फंक्शन) की शाम थी। आइज़ा ने मंच से सीधे सरफराज़ की ओर देखकर अपनी रूह का सारा दर्द एक शेर में उड़ेल दिया,
​तेरे प्यार में हमने वो मक़ाम पाया है,
कि अब लोग हमें तेरे नाम से जानते हैं…
​पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा, मगर बैकस्टेज खड़ी ज़ोया की आँखों से नमक का दरिया बह निकला। वह समझ गईं कि अब यह आग इस स्कूल की ईंट-ईंट जला देगी।
​उसी रात मूसलाधार बारिश हुई। सरफराज़ के ऑफिस में ज़ोया आइज़ा की एक डायरी लेकर पहुँचीं। “ये देखिए सरफराज़ साहब! यह जज़्बात नहीं, आपकी तबाही का सामान है। अगर ये डायरी किसी और के हाथ लगती, तो आपका बरसों का कमाया हुआ ‘एहतराम’ राख़ हो जाता।”
​उसी पल सरफराज़ के फ़ोन की स्क्रीन रोशन हुई। आइज़ा का मैसेज था,”सर! मैं स्कूल के गेट पर बारिश में खड़ी हूँ। अगर आज आप नहीं आए, तो कल का सूरज मेरे हिस्से में नहीं होगा।”
​सरफराज़ उठे। उन्होंने अपनी काली छतरी उठाई और ज़ोया से कहा, “चलिए, आज इस कहानी का आख़िरी सबक़ मुकम्मल करते हैं।”
​बारिश की गूँज के बीच तीनों एक वीरान गलियारे में खड़े थे। आइज़ा भीगी हुई, काँपती हुई मगर अपनी जिद पर अड़ी हुई थी। सरफराज़ ने आइज़ा की वह डायरी ली और सबके सामने उसके दो टुकड़े कर दिए।
​”आइज़ा,” सरफराज़ की आवाज़ में एक ऐसी ख़नक थी जिसने बारिश का शोर दबा दिया। “तुम जिसे इश्क़ समझ रही हो, वह महज़ मेरे ‘अक्स’ से तुम्हारी मोहब्बत है। क्या तुम मेरी उम्र की ढलती शामों, मेरे सफ़ेद बालों और समाज की रुसवाई का बोझ उठा पाओगी? क्या तुम उस औरत का सामना कर पाओगी जिसने बरसों अपनी मोहब्बत को सिर्फ़ इसलिए ‘एहतराम’ का नाम दिया ताकि मेरा सर ऊँचा रहे?”
​उन्होंने ज़ोया की तरफ़ इशारा किया। ज़ोया कांप उठीं। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि सरफराज़ उनकी ख़ामोश इबादत के गवाह थे।
​”और ज़ोया साहिबा! आपकी वफ़ा अज़ल से है, मगर आपकी नफ़रत ने इस बच्ची को बाग़ी बना दिया। अगर आप इसे ‘रक़ीब’ के बजाय ‘तालिब-ए-इल्म’ (शिष्या) समझकर समझातीं, तो यह आज यहाँ इस हाल में न होती।”
​सरफराज़ ने आइज़ा का ठिठुरता हुआ हाथ पकड़कर ज़ोया के हाथ में दे दिया। “मेरा फ़ैसला यह है कि मैं ‘मोहब्बत’ और ‘इश्क़’ में से किसी का चुनाव नहीं करूँगा। आइज़ा, तुम कल यह शहर छोड़ दोगी, मगर एक हारी हुई लड़की बनकर नहीं, बल्कि एक ऐसी अदीब (लेखिका) बनकर जो दुनिया को सिखाए कि इश्क़ पाना नहीं, खुद को संवारना है। और ज़ोया साहिबा… अगर मेरा साथ देना है, तो आज से आप इसकी ‘उस्ताद’ हैं, इसे ममता से संभालें।”
​उस रात के बाद इतिहास बदल गया। आइज़ा दूसरे शहर चली गई और अपनी पूरी ऊर्जा को कलम की ताकत बना लिया। बरसों बाद जब उसकी पहली किताब ‘अधूरा हर्फ़’ छपी, तो उसका ‘इंतसाब’ (डेडीकेशन) सरफराज़ और ज़ोया के नाम था।
​स्कूल में सरफराज़ और ज़ोया की सादगी से शादी हो गई। उनके दरमियां अब कोई परदा नहीं था। वे अक्सर शाम की चाय के साथ आइज़ा के ख़त पढ़ते। वह पुरानी लाइब्रेरी अब भी वैसी ही थी, मगर अब वहाँ सन्नाटा नहीं, एक अजीब सा सुकून था।
​कहानी का अंजाम किसी हवस या तमाशे पर नहीं, बल्कि ‘तहजीब’ पर हुआ। जहाँ उस्ताद का मान भी रह गया, शिष्या का भविष्य भी संवर गया और एक ख़ामोश वफ़ा को उसकी मंज़िल मिल गई। सच है, हवस सिर्फ़ जिस्म और कब्ज़ा ढूँढती है, पर सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ ‘मक़ाम’ ढूँढती है। और कुछ मक़ाम हासिल कर लेने से नहीं, बल्कि हक़ छोड़ देने से ‘अमर’ हो जाते हैं।
​जब उस पुरानी खिड़की से ढलते सूरज की नारंगी किरणें सरफराज़ साहब की खाली मेज़ पर पड़ती हैं, तो वहाँ अब वो पुरानी डायरी नहीं, बल्कि आइज़ा की भेजी हुई किताब रखी होती है। जिस पर लिखा होता है,”इश्क़ जब तहज़ीब का दामन थामता है, तो वह बर्बादी नहीं, तामीर (निर्माण) करता है।”
बरसों बाद, जब स्कूल की उस पुरानी लाइब्रेरी की खिड़की से ढलते सूरज की नारंगी किरणें सरफराज़ साहब की खाली मेज़ पर पड़ती हैं, तो वहाँ अब वो पुरानी डायरी नहीं, बल्कि आइज़ा की भेजी हुई किताब रखी होती है।
​​”इश्क़ अक्सर दो इंसानों के दरमियां एक जंग बन जाता है, लेकिन सरफराज़ ने उसे एक ‘सजदा’ बना दिया। उन्होंने ज़ोया को ‘हक़’ दिया, आइज़ा को ‘हुनर’ और कैरियर की राह दिखा दी, और खुद को ‘वक़ार’ दिया।
​उस रोज़ बारिश थमी तो आसमान पर एक सतरंगी कमान (रेनबो) थी। दुनिया ने देखा कि एक उस्ताद ने मोहब्बत हार कर भी इंसानियत जीत ली थी। हवस जिस्म ढूँढती है, पर मोहब्बत सिर्फ मक़ाम ढूँढती है,और कुछ मक़ाम हासिल कर लेने से नहीं, बल्कि छोड़ देने से अमर हो जाते हैं।

​– डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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