इतिहास

अस्सी वर्ष का वह वीर कुंवर सिंह

इतिहास अक्सर तारीखों और आंकड़ों के बोझ तले दब जाता है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी वीरता कालखंड की सीमाओं को तोड़कर वर्तमान के लिए मशाल बन जाती है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह एक ऐसा ही नाम हैं। आज जब हम राष्ट्रवाद और साहस की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, तब जगदीशपुर के उस ‘बूढ़े शेर’ का स्मरण केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस संकल्प को याद करना है जो उम्र की मोहताज नहीं होती।
कुंवर सिंह के व्यक्तित्व का सबसे विस्मयकारी पक्ष उनकी अवस्था थी। 80 वर्ष की आयु, जहाँ शरीर शिथिल होने लगता है, वहाँ कुंवर सिंह ने घोड़े की जीन पर बैठकर तलवार उठाई थी। यह केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि वह मानसिक दृढ़ता थी जिसे आज का युवा ‘जज्बा’ कहता है। उनका जीवन इस मिथक को तोड़ता है कि क्रांति केवल युवाओं का विशेषाधिकार है। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि ध्येय पवित्र हो और मातृभूमि के प्रति अनुराग गहरा हो, तो धमनियों में दौड़ता रक्त अस्सी की उम्र में भी उबाल मार सकता है।
रणकौशल और कूटनीति का संगम इस दृष्टि से देखें तो कुंवर सिंह का महत्व केवल उनके बलिदान तक सीमित नहीं है। वे एक विलक्षण सैन्य रणनीतिकार थे। सीमित संसाधनों के बावजूद, उन्होंने जिस तरह ‘छापामार युद्ध’ का प्रयोग कर तत्कालीन विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति यानी ब्रिटिश हुकूमत को छकाया, वह आज भी सैन्य विशेषज्ञों के लिए शोध का विषय है। बिहार के जंगलों से लेकर आजमगढ़ के मैदानों तक, उनकी उपस्थिति अंग्रेजों के लिए एक अभेद्य पहेली बनी रही।
कुंवर सिंह का संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी। वे एकता की मिसाल थे,उनकी सेना में हर जाति और धर्म के लोग शामिल थे। ज़ुल्फ़िकार अली और रंगू बापू जैसे योद्धाओं के साथ उनका तालमेल यह दर्शाता है कि 1857 की नींव कितनी समावेशी थी। आज के खंडित समाज में कुंवर सिंह का नेतृत्व हमें याद दिलाता है कि जब लक्ष्य राष्ट्र की स्वतंत्रता हो, तो पहचान की तुच्छ दीवारें ढह जाती हैं।
गंगा को अर्पित वह हाथ, समर्पण की पराकाष्ठा थी,
जब बलिया के पास शिवपुर घाट पर अंग्रेजी सेना की गोली उनके हाथ में लगी, तो उन्होंने विलाप करने या हार मानने के बजाय, अपनी तलवार से अपना ही हाथ काटकर गंगा को भेंट कर दिया। यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे साहसी और मार्मिक घटनाओं में से एक है। यह ‘स्व’ के विसर्जन की वह पराकाष्ठा है, जो केवल एक ऋषि-तुल्य योद्धा ही कर सकता है।
वीर कुंवर सिंह आज केवल बिहार या जगदीशपुर के नहीं हैं,वे संपूर्ण भारत वर्ष की अदम्य जिजीविषा के प्रतीक हैं। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उनके उस निर्भीक चरित्र को आत्मसात करना है। एक ऐसे समय में जब देश नई चुनौतियों से जूझ रहा है, वीर कुंवर सिंह का वह अजेय संकल्प हमें याद दिलाता है कि पराजय शरीर की नहीं, मन की होती है।
इतिहास गवाह है कि हाथ कटने के बाद भी जिस योद्धा ने विजय पताका फहराई हो, वह कभी मर नहीं सकता। वह विचारों में, लोकगीतों में और राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहता है।

वीर कुंवर सिंह, अदम्य साहस

​अस्सी वर्षों की देह कहां थकी थी, तन मन में अंगारा था,
जगदीशपुर का वीर वह बूढ़ा , अंग्रेजों परपड़ा भारी था।
रजवाड़े सारे सोए थे जब, महलों की आराम गाहों में,
इंकलाब की फ़िर गूँज उठी थी, भोजपुर की तलवारों से।
​हाथ कटा गया शीश झुक न पाया, ये अद्भुत गौरव गाथा थी,
गंगा को सौंपी काट खुद भुजा अपनी, ये उसकी मर्यादा थी।
सींचा जिसने रक्त बहाकर, आज़ादी की इस फुलवारी को,
थर-थर कंपा दिया था जिसने, गोरी सेना की मक्कारी को।
​तलवार पुरानी म्यान से निकली, बिजली बन कर गूंज उठी,
जो हिंदुस्तान की गली गली में, ज्वाला बनकर धधक उठी।
उम्र अस्सी की रुकावट कहां बनी, न ज़ख्मों ने रोक रस्ता,
विजय पताका लिए हाथों में, वह लड़ा वीर बेपरवाह, चला।
​नमन करो उस सेनानी को, जिसने भारत का इतिहास रचा,
मरते दम तक वीर भूमि में वो कुंवर शेरों की तरह डटा रहा।
जब तक गंगा मैया बहे धरा पर, नाम कुंवर भी गूँजेगा,
वीर कुंवर का शौर्य सदा सदा ही, भारत माँ को पूजेगा।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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