ये कैसी जद्दोजहद?
ये कैसी जद्दोजहद से भरी है जिंदगी!
किसी को सारे आकाश की मिली है खुशी,
तो कोई मुट्ठी भर खुशी के लिए ताउम्र
जिंदगी भर कर रहा है जद्दोजहद!!
क्या आम आदमी के लिए यह नसीब नही?
क्या वह अपने नसीब को ही कोसता रहेगा?
इस खुशी को पाने का उसका अधिकार नही!
चलो ठीक उसके लिए खुशी नसीब नही।
और अपने अधिकार की भी परवाह नही करता।
तो क्या हम उसको चुटकी भर या मुट्ठी भर,
ज़रा सी खुशी से उसके अंतर्मन के मरे हुए,
सपनो को क्या जीवित नही कर सकते?
सम्भव है,जरूर ,हम ऐसा कर सकते हैं।
पर!हम ऐसा नही करेंगे।क्योंकि हम अपनी
खुशी को बांटना नही चाहते,आम आदमी
की जिंदगी में खुशियों का नया सुरज उगाना
नही चाहते,यह मजबूरी नही है घटिया मनसुबा है।
यही हमारी मानसिकता है।जो हम हमेशा से
आम आदमी की पीड़ा को अनसुना,अनदेखा
करते हैं,यही हमारे लिए फख्र की बात है।
— अशोक पटेल “आशु”
