गीत/नवगीत

।। वन्दे मातरम।।

यूं तो हमारे स्वतन्त्रता आन्दोलन में
अनेक सैनानियों ने किया बड़ा काम
पर वंदे मातरम् के एक नारे ने
अंग्रेज प्रशासन में मचा दिया कोहराम

देशवासियों को एकजुट करने में
इस नारे ने एक अहम भूमिका निभाई
जाति-धर्म की सब टूटी दीवारें
और आंदोलन ने अनोखी गति पाई।

बंकिमचंद्र जी की इस अमर रचना ने
स्वतंत्रता की ऐसी अलख जगाई
आनंदमठ उपन्यास के रचनाकार ने
सम्पूर्ण विश्व से प्रशंसा पाई।।

मातृभूमि की आजादी के मतवालों ने
इस उद्घोष को अपना हथियार बनाया
हंसते-हंसते चूमा फांसी का फंदा
और वंदे मातरम् का जयकारा लगाया

न कोई शिकवा, न कोई शिकायत
दिल में बस एक आजादी की चाहत
खुलकर लिया फिरंगियों से पंगा
और लाठी -गोली का किया स्वागत।

यदा-कदा मतभेद होने के बावजूद
सब बने इस आंदोलन का हिस्सा
मुक्त कंठ से बोले सब वंदे मातरम्
घर-घर का बना यह कहानी – किस्सा

आजादी के बाद सन् १९५० में इसे
राष्ट्र गीत के रूप में अपनाया गया
श्री बंकिमचंद्र जी के महान गीत को
कोटि-कोटि कंठों द्वार गाया गया।।

पलावा स्थित चेतना समूह भी
इस नारे से हुआ अत्यधिक प्रभावित
इसीलिए श्री संदीप जी के नेतृत्व में
इसके मंचन का हुआ प्रस्ताव पारित

हम दोनों भी बने मंच के भागीदार
इसके लिए चेतना का हार्दिक आभार
१८ अप्रैल को हुआ नाट्य का मंचन
वंदे मातरम् की गूंजी जय-जयकार।।

ढाई घंटे का हमारा वन्दे मातरम् प्ले
अपने मंतव्य में हुआ सम्पूर्ण सफल
७० दिनों के अथक परिश्रम का
सब कलाकारों को मिला अद्भुत फल

जुग जुग जीये वन्दे मातरम् का नारा
जिसको हम सबने मिलकर उच्चारा
चेतना मंच की भी करूं जय-जयकार
जिसने छुपी हुई प्रतिभा को उभारा।।

जय हिंद जय भारत
वंदे मातरम – वंदे मातरम्
।।वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्।।

— नवल अग्रवाल
सुधा अग्रवाल

१९ अप्रैल २०२६

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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