चरागों के हम दीप जलाते रहेंगे
चरागों के हम दीप जलाते रहेंगे,
टूटी हुई कसमें भी निभाते रहेंगे,
ये ज़िंदगी मौत का अनवरत सा खेल,
चिताओं की राख में भी मुस्काते रहेंगे।
अंधेरों की गहराई चाहे बढ़ती रहे,
हम उजालों के दीपक सजाते रहेंगे,
हवाओं ने लाख कोशिशें की हों मगर,
हम हर बार लौ को बचाते रहेंगे।
ये दुनिया है ठोकरों का एक सिलसिला,
जहाँ हर मोड़ पर दर्द मेहमान बना,
जो सुन ले खामोशी में दिल की सदा,
हम वैसा ही दिल सजाते रहेंगे।
ग़मों की स्याही में भी रंग भरकर,
हम अपनी कहानी लिखते रहेंगे,
जो जख्म मिले इस सफ़र-ए-हयात में,
उन्हें शायरी बनाकर सजाते रहेंगे।
रिश्ते यहाँ मौसम की तरह बदलते,
कभी धूप, कभी छांव बन जाते,
जो छूट गए राहों में कहीं बीच में,
हम यादों के दीप जलाते रहेंगे।
न शिकवा करेंगे, न कोई गिला,
हर हाल में अपनी रज़ा ढूंढ लेंगे,
अगर रूठ जाएं मुकद्दर की लकीरें,
तो मेहनत से उन्हें मनाते रहेंगे।
गिरकर जो उठे, वही असली विजेता,
हार में भी जो हिम्मत का गीत गाए,
हर ठोकर को हम सीख मानकर,
नए हौसलों को जगाते रहेंगे।
ये राख भी अपनी कहानी कहेगी,
कि आग कभी दिल में जली थी यहाँ,
उसी चिंगारी को सीने में लेकर,
हम खुद को फिर से बनाते रहेंगे।
न थकेंगे कभी, न रुकेंगे कहीं,
इरादों को अपने निभाते रहेंगे,
ये राहें कठिन हों या कांटों भरी,
हम हंसकर इन्हें अपनाते रहेंगे।
जब तक ये सांसें चलती रहेंगी,
जब तक धड़कनों में साज़ रहेगा,
तब तक ये जंग-ए-ज़िंदगी जारी,
हम जीने का हक़ निभाते रहेंगे।
चरागों के हम दीप जलाते रहेंगे,
हर अंधेरे में उजाला करते रहेंगे।
— रूपेश कुमार
