अधखिली कली
यूं कलियां कई निकलती हैं पौधों पर
पर क्या सबके किस्मत में
चटखना होता है
खिलना होता है
खुशबू बिखेरना होता है
महकना होता है
जीवन चक्र पूर्ण करना होता है
नहीं ऐसा नहीं होता है
कुछ टूट जाते हैं
कुछ तोड़े जाते हैं
कुछ गिर जाते हैं
कुछ गिराए जाते हैं
कुछ सूख जाते हैं
कुछ मसल दिए जाते हैं
फिर भी प्रकृति की प्रक्रिया
कुछ ऐसी है
सारी यातनाओं, संभावनाओं से
लड़ते, जूझते अपनी मंज़िल पा लेती हैं
हां वो खिलती हैं
महकती है
रंगों से सजी धजी
सुगंध बिखेरती हैं
तितलियों को आकर्षित करती हैं
जीवन चक्र पूर्ण करके
बीज में परिणत हो पूर्णता
की ओर अग्रसर होती है
पुनः बीज से अंकुरित हो
एक नए सफर
एक नए संघर्षों का सफर
आरंभ करती है
अधखिली तो वहीं
दम तोड़ देती हैं।
— बबली सिन्हा
