पंचायतीराज और नगरीय निकाय के चुनाव को कुचलता शासन
पंचायती राज अर्थात् गांव की सरकार। यह सोच 2000 साल पुरानी है ऋग्वेद मौर्य काल तक गांव व्यवस्था थी जिसमें गांव अपने फैसले स्वयं लेता था। जिसे सभा एवं समिति के रूप में जाना जाता था। भारत में पंचायत ग्रामीण स्तर पर स्थानीय स्वशासन की सबसे पुरानी और बुनियादी संस्था है ,जो “पांच’ निर्वाचित प्रतिनिधियों ‘पंचों’ और एक मुखिया (सरपंच) से मिलकर बनती है ।
महात्मा गांधी का सपना था – “असली भारत गांव में बसता है । भारत की आत्मा पंचायत में है । उनका मानना था – हर गांव स्वराज हो I’
भारत में पंचायती राज का जनक बलवंत राय मेहता को माना जाता है। उन्होंने 1957 में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के तहत तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का सुझाव दिया था। इसके बाद भारत में ग्रामीण स्वशासन की नीति बनी। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्घाटन करके की गई ।
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को लागू करना, स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना और विकास प्रक्रिया में आम नागरिकों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना है।देश में ग्रामीण क्षेत्र में सामाजिक न्याय,आर्थिक विकास और आत्मनिर्भर बनाने हेतु बढ़ावा देने से है। इसका मुख्य नारा है – “पंचायती राज समुदाय को सशक्त बनाना”
पंचायती राज के गठन हेतु पांच समितियां बनी थी – [ i ] बलवंत राय मेहता समिति 1957 [2] अशोक मेहता समिति 1977 [3]जी०वी०के० राव समिति 1985 [4] एल ०एम० सिंघवी समिति 1986 और [5] पी०के० थुंगन समिति 1989
नेहरू जी का मानना था -“लोकतंत्र ऊपर से नहीं नीचे से मजबूत हो ना चाहिए।”
2 अक्टूबर 1959 में राजस्थान के नागौर में नेहरू जी ने प्रथम पंचायती राज लागू किया और उन्होंने कहा था -“सत्ता का विकेंद्रीकरण अब शुरू हुआ।”
गांधी जी का ‘ग्राम स्वराज’ का पूरा दर्शन ही इसी पर टिका था। वो कहते थे:
“असली स्वराज कुछ लोगों द्वारा सत्ता हथियाने में नहीं है, बल्कि सबके द्वारा सत्ता हासिल करने की क्षमता में है। सत्ता गांव की पंचायत से शुरू होकर ऊपर तक जानी चाहिए।”
उनके शब्द: “हर गांव एक छोटा गणराज्य हो” और “लोकतंत्र की इमारत सबसे निचली ईंट यानी गांव से शुरू होती है।”
जयप्रकाश नारायण (जेपी) का
जेपी ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ में कहा था: “दिल्ली में बैठे 500 लोग देश नहीं चला सकते। सत्ता का विकेंद्रीकरण करो। लोकतंत्र को पंचायत से संसद तक मजबूत करो।”।
राजीव गांधी ने 1989 में पंचायती राज बिल पेश करते हुए कहा था: “जब तक सत्ता गरीब की झोपड़ी तक नहीं पहुंचेगी, लोकतंत्र अधूरा है। पावर का पिरामिड उल्टा करो – सबसे ज्यादा ताकत नीचे वाले को दो।”
73वें और 74वें संशोधन इसी सोच का नतीजा थे।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर का भी, लेकिन शर्त के साथ*
अंबेडकर शुरू में गांवों को ‘जातिवाद का अड्डा’ मानते थे। पर बाद में उन्होंने माना कि “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र नीचे तक न पहुंचे।”
महात्मा गांधी की मंशा को राजीव गांधी ने इसे संविधान में उतारा।
इसलिए आज जब राजस्थान सरकार पंचायत या निकाय चुनाव नहीं कराती, तो वो गांधी, जेपी और राजीव तीनों के सपने के खिलाफ काम कर रही है।
“लोकतंत्र ऊपर से थोपा नहीं जाता, नीचे से उगाया जाता है” – गांधी
राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए और विकास के लिए राजीव गांधी ने पंचायत और नगर निकाय को मजबूत बनाने हेतु कदम उठाया ।उन्होंने पंचायत को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 64 वां संविधान संशोधन लाए। लोकसभा में बिल पास हुआ।किंतु राज्यसभा में दो वोट से गिरा दिया गया। बाद में पी०वी० नरसिम्हा राव ने पूरा किया।1992- 93 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन पास कराकर। 24 अप्रैल 1993 में पूरे देश में लागू होने के कारण 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।आज से 33 वर्ष पूर्व 24 अप्रैल 1993 को 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू किया गया और पूरे देश में लोकतंत्र को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था। इसके बाद 24 अप्रैल को प्रति वर्ष राष्ट्रीय पंचायत राज दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस सिर्फ सरकारी योजना और स्वाभिमान का प्रतीक नही है।
राजीव गांधी का कहना था-“दिल्ली से ₹1 चलता है गांव तक 15 पैसा पहुंचता है बिचोलिया खा जाता है।”
73वें संविधान संशोधन के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा दिया गया है।अब कोई भी इसे खत्म नहीं कर सकता है। 5 वर्ष का कार्यकाल फिक्स है और समय पर चुनाव करना भी जरूरी है। 33% महिलाओं के लिए रिजर्वेशन किया गया है। आज 31 लाख पंचायत में से 14.5 लाख महिलाएं चुनकर आई हैं। आबादी के हिसाब से रिजर्वेशन है। 29 विषय पंचायत के पास है। राज्य वित्त आयोग पंचायत का बजट में हिस्सा पक्का है। आज देश में 45% से ज्यादा सरपंच महिलाएं हैं। पंचायती राज अर्थात् ‘पावर टू द पीपल’। दिल्ली के शासन को गांव तक लाना है । राजीव गांधी की कोशिश 64वां संविधान संशोधन बिल विधेयक 1989 मिलाया गया था जिसका उद्देश्य पंचायत को संवैधानिक दर्जा देने से है। 73वां संविधान संशोधन 1992 में राजीव गांधी के सपने को पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने पूरा किया। यही आज का पंचायती राज कानून है। पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष रहेगा।अनुच्छेद 243 में कोई मुख्यमंत्री बीच में पंचायत को भंग नहीं कर सकता है। चुनाव समय पर होंगे ।
संविधान के गठन के समय अनुच्छेद 40 के अंतर्गत राज्य नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत यही कहा गया है कि-” राज्य ग्राम पंचायत का गठन करेगा।” लेकिन इस बात की दिक्कत यह थी कि यह जरूरी नहीं था। राज्य चाहे तो माने चाहे ना माने इसलिए पंचायत कमजोर थी ।राजीव गांधी ने कहा -“अनुच्छेद 40 से काम नहीं चलेगा। पंचायत को मौलिक अधिकार देना पड़ेगा।” इसलिए उन्होंने भाग 9 और अनुच्छेद 243 जोड़ने का बिल लाया।1992 में वही बिल 73वें संविधान संशोधन के नाम से पास हुआ।अनुच्छेद 40 में पंचायत बनाने की बात कही गई है।-‘कोशिश करना ।’परंतु राजीव गांधी ने कहा -” कोशिश नहीं गारंटी दो ।”अतः अनुच्छेद 243 लाए व 5 वर्ष की अवधि गांव का बजट पक्का किया। महिलाओं की कुर्सी पक्की की। राजीव जी ने सोचा है भी और उसे संविधान में मान्यता भी दिलवाई। उन्होंने अनुच्छेद 40 की सलाह को अनुच्छेद 243 की गारंटी में परिवर्तित किया और संविधान के भाग 9 और 11वीं अनुसूची में जुड़वाया भी।
24 अप्रैल 1993 के दिन संविधान ने यह कहा था अनुच्छेद 243 पंचायत का कार्यकाल 5 साल होगा 5 साल पूरे होते ही चुनाव करवाने होंगे लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि वर्तमान सरकार संविधान का उल्लंघन कर रही है पंचायत का कार्यकाल खत्म हुए कितने महीने गुजर गए अभी तक चुनाव का कोई अता-पता नहीं है। यह पंचायत राज दिवस नहीं बल्कि पंचायती राज दिवस की हत्या है ।आज ग्राम पंचायत अनाथ की तरह हो गई है। अफसर राज आ गया है। आज 33% महिला आरक्षण की धज्जियां उड़ रही है और हमारी 14 लाख बहनें घर बैठी हैं। ग्राम सभा मर गई है। ऐसा प्रतीत होता है। बजट पास कौन करेगा? और हिसाब कौन मांगेगा ? यह लोकतंत्र नहीं जंगल राज है। कुशासन है।
एक समय था जब राजस्थान में देश को एक नया रास्ता दिखाने का काम किया था। आज राजस्थान सरकार रास्ता रोकने का काम कर रही है।गांव राज है तो उसे जिंदा रखो चुनाव करो। एक महीने के भीतर नहीं तो कुर्सी खाली करो। “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” राज्य सरकार चुनाव नहीं करवाती है तो संविधान की मूल भावना पर सीधा हमला है।
संविधान में सामाजिक न्याय हेतु अनुच्छेद 243डी के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में और महिलाओं के लिए एक तिहाई सिटें आरक्षित की गई है। आज देश की 31 लाख पंचायत में प्रतिनिधियों में से 14.5 लाख महिलाएं और 20 राज्यों में तो महिलाओं को आरक्षण बढ़कर 50% कर दिया है। यह महिला सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है।आज देश में 2॰62 लाख से अधिक ग्राम पंचायतें,6659 पंचायत समितियां और 665 जिला परिषद हैं। 31 लाख से अधिक निर्वाचित जमीनी प्रतिनिधि लोकतंत्र को मजबूत बनाए हुए हैं ।अनुच्छेद 243Uनगर पालिकाओं के कार्यकाल से संबंधित है यह 74वें संविधानिक संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा जोड़ा गया था जो शहरी स्थानीय निकायों के लिए 5 साल का निश्चित कार्यकाल और समय पर चुनाव सुनिश्चित करता है।यदि नगर पालिका को 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पहले भंग कर दिया जाता है तो भंग होने की तारीख से 6 महीने की भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है ।पंचायती राज और स्थानीय निकाय चुनाव में देरी होने पर सरकार की नाकामी और लोकतंत्र की हत्या और संविधान का उल्लंघन है।
अनुच्छेद 243 K के अंतर्गत पंचायत ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने से संबंधित है।अनुच्छेद 243K का उद्देश्य स्थानीय स्वशासन पंचायती राज को संवैधानिक रूप से मजबूत बनाना है ।
74 व संशोधन शहरों की नगर पालिकाओं के लिए है। राजीव गांधी का विजन था1989 में 65व वाँ संशोधन बिल लाए थे नगर पालिकाओं के लिए जो राज्यसभा में गिर गया बाद में नरसिम्हा राव की सरकार ने 74वाँ संशोधन के रूप में पास कराया।
73वां संशोधन राजीव गांधी गांव के लिए लाए थे 74वां संशोधन शहर के लिए लाए थे।जयपुर हो चाहे दिल्ली का वार्ड हो। राज तो चलेगा जनता का। 73वां संशोधन गांव की संसद और 74वां संशोधन शहर की संसद। दोनों का मकसद एक सत्ता को जनता के दरवाजे तक ले जाने का था ।
समय पर चुनाव नहीं करवाना सरकार का शासन तंत्र फेल माना जाता है ।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया है किचुनाव समय पर कारण राज्य सरकार कासंवैधानिक दायित्व है ,स्वेच्छा नहीं ।संविधान की हत्या संवैधानिक मशीनरी का फेल होना है। अब देखना यह है कि राजस्थान सरकार उचित कदम उठा पाएगी या जनता को गुमराह में रखना चाहती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर जोर शोर से जयकारा लगाने वाली सरकार क्या डॉ.बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान का मान रख पाएगी!!!
— डॉ. कान्ति लाल यादव
