नींद की मर्यादा
रात का आँगन
चुपचाप बिछा देता है
सपनों की चादर
थकी पलकों पर
शांत उतरती है हवा
समय सो जाता
दीपक की लौ भी
धीरे-धीरे झुक जाती
अंधेरे की ओर
चाँद मुस्काता
खिड़की से झाँकता है
नींद के भीतर
शहर की धड़कन
कुछ देर को रुक जाती
सन्नाटा गहरा
यादें करवट लें
पुराने दिन जाग उठें
फिर खो जाएँ
नींद की सीमा
मन को बाँध लेती है
मौन के धागे
सपनों की गली
अनजानी राहों पर
ले जाए दूर
आँखों का समुंदर
लहरों सा थम जाता है
रात के संग
विचार भी सोएँ
निर्णयों की थकान में
विश्राम पाएँ
प्रकृति की गोद
सबको समान देती है
नींद का अधिकार
टूटे रिश्ते भी
नींद में जुड़ जाते हैं
मौन आलिंगन
रात का नियम
हर जीव को सिखाता है
ठहराव का अर्थ
साँसों की लय
धीरे-धीरे मंद पड़ती
शांति गहरी
चाँदनी पथ पर
सपनों का कारवाँ चले
अदृश्य होकर
आँखों के द्वार
नींद जब दस्तक देती
सब कुछ थम जाए
मन का विस्तार
खुद में ही खो जाता है
शून्य के पार
नींद की मर्यादा
जीवन को संतुलन दे
नई सुबह तक
— डॉ. अशोक
