गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

तुम्हारी हो गई कान्हा हृदय अनुराग जागा है।
लिए मन भावना यह तो तुम्हारी ओर भागा है।।

सदा चलती हुईं साँसें तुम्हारा नाम लेती हैं।
रहा है साथ ये तो देख सोने में सुहागा है।।

नहीं चिंतन करे जो भी उसे कब ईश मिलते हैं।
जपे जो नाम उसका आज महका देख बागा है।।

करो व्यवहार प्यारा – सा सुनो आदर मिलेगा ही।
तभी कान्हा समझते बोल मीठे ही सुरागा है।।

उठी जब भावना मन में चरण ही छू लिए हमने।
इन्हीं चरणों में रह लूँ मैं जरा- सा स्थान मागा है।।

समर्पित हो गया मन आज न अब तो यह अलग होगा।
( न टूटेगा कभी अपना जुड़ा वो प्रेम धागा है।।)

अभी गाता रहे मन नित्य पढ़ूँ मैं प्यार की भाषा।
अभी देखो तुम्हारे संग ही यह आज रागा है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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