अपने प्यारे गाँव से
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।
बूढ़ा पीपल है कहाँ, गई कहाँ चौपाल॥
माटी की सोंधी महक, अब लगती है दूर,
कंक्रीटों के बीच में, खो बैठे हम नूर।
रिश्तों की हर डोर अब, लगती क्यों बेहाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।।
खेल-कूद के दिन गए, छूटा बचपन साथ,
मोबाइल में कैद है, हर रिश्ते की बात।
हँसी-ठिठोली खो गई, सूना हर घर-द्वार—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
बाबा की वो छाँव थी, माँ का स्नेह अपार,
कहाँ गए वो लोग सब, कहाँ गया संस्कार।
टूट गई हर परंपरा, बदला सारा हाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
लौट चलें उस ओर अब, जहाँ प्रेम की छाँव,
पीपल, बड़, चौपाल सँग, बसता सच्चा गाँव।
मन फिर से ये पूछता, ढूँढे हर इक हाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
