गीत/नवगीत

किस क़दर टूटा हूँ

किस क़दर टूटा हूँ, तुमको क्या बताऊँ,
जिस्म छलनी छलनी, तुमको कैसे बताऊँ?

जबसे दी तुमने क़सम भूलने की,
दिया था वास्ता मेरी ही मोहब्बत का,
तबसे खुद को ही भुलाकर जी रहा हूँ,
याद है क़िस्सा बस तेरी मोहब्बत का।

याद जब जब आयी बिस्तर चुभने लगा,
ज़ख़्म दिल पर कितने लगे कैसे बताऊँ?

उस गली जाना मैंने छोड़ दिया, तेरा मकां था,
जाता नहीं उस छत पर, दिखता तेरा मकां था।
सर्दियों की दोपहर, गुनगुनी धूप मिलने की चाह,
बगीचा आम का याद आता, जहाँ तेरा मकां था।

तुम कहाँ कैसी हो नहीं जानता, याद भी करता नही,
रोज़ सुबह हिचकी आती तेरी, तुमको कैसे बताऊँ?

तेरी चाहत में लिखे गीत, हो गये डायरी में क़ैद,
कब मिलेगी उनको राहत, जिनको सज़ा उम्र क़ैद?
पर बता कम्बख़्त बग़ावती, अहसासों का क्या करें,
आँसुओं का सैलाब बन, तोड़ने को वादों की क़ैद।

इश्क़ करने की सज़ा मुझको मिली कितनी हसीं,
शुष्क नयन दिल रोता, लब पर हँसी कैसे बताऊँ?

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन

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