पसीने की बूंद में विश्वास
वो मिट्टी की खुशबू, हाथों में रखती पानी,
थाली में झलकी थी ‘मेहनत’ की कहानी।
सुबह की किरण संग ‘काम’ पर थी जाती,
यूं अपनों के सपनों को चुपचाप सजाती।
कलिता कभी घर-घर ‘बर्तन’ धोती थी वो,
हर एक चोट को ‘हंसकर’ संजोती थी वो।
बहते पसीने की हरेक बूंद में यहीं विश्वास,
हाँ एक दिन बदलेगा जीवन का इतिहास।
इस छोटे से ‘आंगन’ में बहुत बड़े अरमान,
थकान के पीछे छिपा ‘विशाल’ आसमान।
लोगों की नज़रों में थी एक आम-सी नारी,
यूं दिल ने भरी ‘उड़ान’ जलें चिंगारी प्यारी।
चलते-चलते राहें मंज़िल जो खुद बन गईं,
उसके कदमों की आहट पहचान बन गई।
आज वही हाथ जो बर्तनों को चमकाते थे,
वो सपनों के दीपक रात में टिमतिमाते थे।
अब मेहनत रंग लायी हैं व बदली तक़दीर,
संघर्ष की गूंज है राजनीति उसकी तासीर।
बंगाल की ‘आसग्राम’ से बनी है विधायक,
वो ढाई हजार जुटाने वाली माझी नायक।
(संदर्भ-बर्तन धोनेवाली कलिता माझी बनी विधायक)
— संजय एम तराणेकर
