राजनीति

बेचारी जनता

आज के भारत का राजनैतिक परिदृश्य एक ऐसे जटिल और संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है जहाँ लोकतंत्र के आदर्श और सत्ता की भूख के बीच की रेखा निरंतर धुंधली होती जा रही है। राजनीति, जो कभी राष्ट्र-निर्माण का पवित्र अनुष्ठान मानी जाती थी, अब वह काफ़ी हद तक ‘पावर-प्ले’ और ‘मैनेजमेंट’ के खेल में तब्दील हो चुकी है। यदि हम आचार्य चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ के पन्नों को पलटकर आज की स्थिति की तुलना करें, तो एक गहरा विरोधाभास उभरता है, चाणक्य ने उद्घोष किया था कि प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हितनिहित है, किंतु आज की राजनीति का केंद्र ‘प्रजा’ नहीं बल्कि ‘पद’ बन गया है। यह पद की लालसा ही है जिसने ‘दलबदल’ जैसी अनैतिक परंपरा को एक रणनीतिक कौशल का दर्जा दे दिया है, जहाँ रातों-रात निष्ठाएं बदल जाती हैं और विचारधाराएं सत्ता की वेदी पर बलि चढ़ा दी जाती हैं। यह दलबदल केवल राजनैतिक दलों का फ़ेरबदल नहीं है, बल्कि यह उस आम मतदाता के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है, जो एक विशेष मूल्यबोध को चुनकर अपना मत देता है। जब राजनेता कुर्सी के अहंकार में डूबे होते हैं, तब वे भूल जाते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं है, परंतु उनके द्वारा लिए गए निर्णय राष्ट्र की नियति तय करते हैं। स्वार्थ की इस अंधी दौड़ ने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच के संतुलन को भी डगमगा दिया है,विशेषकर न्यायपालिका पर राजनेताओं का बढ़ता हुआ अप्रत्यक्ष दबाव और संस्थागत स्वायत्तता में हस्तक्षेप की कोशिशें लोकतंत्र की जड़ों को खोख़ला कर रही हैं। जब न्याय की सर्वोच्च चौखट पर भी राजनैतिक लाभ-हानि की छाया पड़ने लगती है, तो समाज का अंतिम व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करने लगता है। यही वह ‘बेचारी’ जनता है, जिसे हर पांच साल में बड़े-बड़े सपनों का झुनझुना पकड़ाया जाता है, जिसे धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के संकीर्ण गलियारों में उलझाकर रखा जाता है ताकि वह कभी भी अपने मौलिक अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर कड़े सवाल न पूछ सके। आज की राजनीति में ‘जीत’ का अर्थ जनसेवा का अवसर प्राप्त करना नहीं, बल्कि विरोधियों को साम-दाम-दंड-भेद से कुचलकर अपनी सत्ता का विस्तार करना बन गया है। लोक-लुभावनवाद और मुफ़्त की घोषणाओं ने जनता को एक ऐसे ‘उपभोक्ता’ में बदल दिया है जो अपनी लंबी अवधि के हितों को तात्कालिक लाभ के बदले गिरवी रख रहा है। चाणक्य ने चेतावनी दी थी कि जिस राज्य में दंड का भय समाप्त हो जाए और भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन जाए, वहाँ अराजकता का जन्म होता है, आज हम देख रहे हैं कि किस तरह धनबल और बाहुबल ने राजनैतिक शुचिता को हाशिए पर धकेल दिया है। राजनीति अब केवल चुनाव जीतने की कला बन गई है, देश चलाने की नहीं। इस बदलते परिदृश्य में अहंकार इतना प्रबल है कि संवाद की जगह विवाद ने और विमर्श की जगह कुतर्क ने ले ली है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच का वह लक्ष्मण-रेखा जैसा सम्मान अब धुंधला चुका है, जिससे आम नागरिक का तंत्र पर से भरोसा कम हो रहा है। अंततः यदि भारतीय राजनीति को अपनी खोई हुई गरिमा वापस पानी है, तो उसे चाणक्य के उस मूल मंत्र की ओर लौटना होगा जहाँ त्याग को भोग से ऊपर और राष्ट्र को दल से ऊपर रखा गया था, अन्यथा सत्ता की यह लिप्सा लोकतंत्र के सुंदर भवन को खंडहर में तब्दील करने की क्षमता रखती है। यह समय केवल राजनेताओं के बदलने का नहीं, बल्कि राजनीति के चरित्र को बदलने का है ताकि ‘बेचारी जनता’ सही मायनों में ‘सशक्त नागरिक’ बन सके और न्यायपालिका निर्भय होकर संविधान की रक्षा कर सके।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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