वृद्ध वंदन, संवेदना संबल : सम्मानपूर्ण सहारे से सशक्त समाज
भारत आज एक ऐसे सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जहाँ वृद्धजनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। चिकित्सा सुविधाओं में सुधार, औसत आयु में वृद्धि और जीवन स्तर में परिवर्तन के कारण समाज में वरिष्ठ नागरिकों की आबादी तेजी से विस्तृत हो रही है। परंतु इसके साथ ही एक गंभीर चिंता भी सामने आई है कि जिस समाज में कभी बुजुर्गों को अनुभव, ज्ञान और परंपरा का आधार माना जाता था, उसी समाज में आज अनेक वृद्धजन उपेक्षा, अकेलेपन और असुरक्षा का जीवन जीने को विवश हैं। ऐसे समय में वृद्धजनों की सम्मानपूर्वक देखरेख केवल परिवार का दायित्व नहीं रह जाती, बल्कि यह समाज और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों को सदैव पूजनीय माना गया है। परिवारों में उनकी भूमिका केवल सलाहकार की नहीं होती थी, बल्कि वे नैतिक मूल्यों और सामाजिक संस्कारों के संवाहक भी होते थे। संयुक्त परिवार व्यवस्था में बुजुर्गों को सुरक्षा, सम्मान और अपनापन प्राप्त होता था। किंतु आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, उपभोक्तावाद और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। आज रोजगार और शिक्षा के कारण युवा पीढ़ी महानगरों की ओर पलायन कर रही है, जिससे गाँवों और छोटे शहरों में रहने वाले अनेक वृद्धजन अकेले रह जाते हैं। कई बार तो वे आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से इतने असुरक्षित हो जाते हैं कि उनका जीवन संघर्ष और उपेक्षा का प्रतीक बन जाता है।
वृद्धावस्था जीवन का वह चरण है जब व्यक्ति को सबसे अधिक सहारे, संवेदना और सुरक्षा की आवश्यकता होती है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर कमजोर होता है, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ती हैं और आर्थिक क्षमता भी सीमित हो जाती है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, जोड़ों का दर्द और दृष्टि संबंधी समस्याएँ सामान्य हो जाती हैं। इसके साथ ही अकेलापन, अवसाद और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ भी गंभीर रूप ले लेती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे देश में वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँचा अभी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ भी सीमित हैं, जिसके कारण बुजुर्गों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता।
सरकार ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम अवश्य उठाए हैं। “माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, दो हजार सात” के माध्यम से यह व्यवस्था की गई कि संतानें अपने माता-पिता की देखभाल के लिए उत्तरदायी हों। इसी प्रकार “वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम” के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। परंतु इन योजनाओं और कानूनों का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब उनका क्रियान्वयन पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ किया जाए। आज भी अनेक वृद्धजन ऐसे हैं जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है, और जो योजनाओं का लाभ लेने के लिए प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करते हैं।
वृद्धजनों की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक असुरक्षा है। देश की बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत रही है, जहाँ सेवानिवृत्ति के बाद किसी प्रकार की नियमित पेंशन या आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं होती। परिणामस्वरूप वृद्धावस्था में वे पूरी तरह परिवार पर निर्भर हो जाते हैं। यदि परिवार सहयोगी न हो, तो उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार ऐसी सार्वभौमिक पेंशन व्यवस्था विकसित करे जिससे प्रत्येक वृद्ध व्यक्ति को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो सके। वृद्धावस्था में आर्थिक आत्मनिर्भरता व्यक्ति के आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक होती है।
सामाजिक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। आज अनेक परिवारों में बुजुर्गों को निर्णय प्रक्रिया से अलग रखा जाता है। उनकी भावनाओं और अनुभवों को महत्व नहीं दिया जाता। कई बार उन्हें बोझ की तरह देखा जाने लगता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत दुखद स्थिति है। वास्तव में बुजुर्ग समाज की जीवित धरोहर होते हैं। उनके अनुभव और जीवन संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। यदि समाज अपने बुजुर्गों का सम्मान करना छोड़ देता है, तो वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी कटने लगता है।
विदेशों में वृद्धजनों की देखभाल को लेकर अनेक प्रभावी व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं। जापान जैसे देश में वृद्धजनों के लिए दीर्घकालिक देखभाल की ऐसी व्यवस्था है जिसमें सरकार, समाज और स्थानीय संस्थाएँ मिलकर कार्य करती हैं। वहाँ बुजुर्गों को केवल सहायता प्राप्त व्यक्ति नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें सक्रिय सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। यूरोप के अनेक देशों में वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामुदायिक देखभाल की मजबूत व्यवस्था है। वहाँ वृद्धाश्रमों को उपेक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि गरिमामय जीवन के केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। भारत में भी इस दिशा में गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है।
अवसंरचना के स्तर पर भी व्यापक सुधार अपेक्षित हैं। हमारे शहर और गाँव अभी तक वृद्धजनों के अनुकूल नहीं बन पाए हैं। सार्वजनिक परिवहन, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी सुविधाओं का अभाव है जो बुजुर्गों को सहज और सुरक्षित अनुभव प्रदान कर सकें। सड़कों पर सुरक्षित पैदल मार्ग, सार्वजनिक स्थानों पर बैठने की व्यवस्था, अस्पतालों में विशेष कक्ष और वृद्धजन अनुकूल आवासीय योजनाएँ आज समय की आवश्यकता बन चुकी हैं।
तकनीक भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। दूरभाष आधारित चिकित्सा सेवा, स्वास्थ्य निगरानी उपकरण और आपातकालीन सहायता प्रणालियाँ वृद्धजनों के जीवन को अधिक सुरक्षित बना सकती हैं। परंतु इसके लिए उन्हें तकनीकी रूप से सक्षम बनाना भी आवश्यक है। डिजिटल साक्षरता के माध्यम से बुजुर्गों को नई तकनीकों से जोड़ा जा सकता है, जिससे वे समाज और परिवार से अधिक जुड़े हुए महसूस करेंगे।
समाज की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण है। परिवारों को यह समझना होगा कि वृद्धजनों की सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य और सांस्कृतिक मूल्य है। बच्चों में बचपन से ही बुजुर्गों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की भावना विकसित की जानी चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं जो पीढ़ियों के बीच संवाद और समझ को बढ़ावा दें।
स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामाजिक संगठन भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। सामुदायिक केंद्र, स्वास्थ्य शिविर, परामर्श सेवाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम वृद्धजनों को सक्रिय और आत्मविश्वासी बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। मीडिया को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए और समाज में यह संदेश प्रसारित करना चाहिए कि बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि समाज की अमूल्य पूँजी हैं।
अंततः यह स्पष्ट है कि वृद्धजनों की सम्मानपूर्वक देखरेख केवल सरकारी योजनाओं या कानूनी प्रावधानों से संभव नहीं है। इसके लिए संवेदनशील समाज, उत्तरदायी परिवार और दूरदर्शी शासन व्यवस्था की आवश्यकता है। जिस समाज में बुजुर्ग सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीते हैं, वही समाज वास्तव में सभ्य और विकसित माना जा सकता है। वृद्धजन हमारे अतीत की स्मृति, वर्तमान की चेतना और भविष्य के मार्गदर्शक हैं। इसलिए उनका सम्मान, सुरक्षा और सुखद जीवन सुनिश्चित करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
