अक़्स और परछाइयाँ
वक़ार अहमद की ज़िंदगी अब एक ठहरी हुई झील की तरह थी। एक छोटा सा शहर, चंद वफ़ादार दोस्त और अपनी तन्हाई,यही उनका कुल सरमाया था। एक शाम, जब ढलते सूरज की नारंगी रोशनी उनके खामोश कमरे के फर्श पर रेंग रही थी, तभी मोबाइल की थरथराहट ने सन्नाटा तोड़ दिया। वक़ार को अंदाज़ा नहीं था कि यह घंटी बरसों पुराने किसी बंद दरवाज़े पर दस्तक दे रही है।
“हैलो? कौन है?” वक़ार ने धीमे से पूछा।
“वक़ार भाई…” दूसरी तरफ़ से एक ऐसी कंपकंपी भरी आवाज़ आई जिसने वक़ार के हाथ ठंडे कर दिए। यह आवाज़ उन्हें झटके से उनके पुराने गाँव की उन धूल भरी गलियों में ले गई, जहाँ यादें आज भी साँस लेती थीं। “पहचान लिया न? मैं… अहमद पटेल,साहब की बेटी, ज़ोया।”
वक़ार का दिल धक से रह गया। आँखों के सामने वह आलीशान हवेली, अहमद पटेल साहब का गाँव में वह दबदबा और ज़ोया की वह बेफ़िक्र, ख़नकती हंसी एक मंज़र की तरह कौंध गई। लेकिन अगले ही पल ज़ोया की सिसकियों ने हक़ीक़त का ज़हर घोल दिया।
“वक़ार भाई, मैं पूरी तरह बर्बाद हो गई,” वह फूट-फूट कर रोने लगी। “वो गाँव डूबा तो लगा था कि सिर्फ़ ज़मीन छूटी है, पर अब लगता है कि नसीब ही डूब गया। अब्बा का साया उठा तो लगा पहाड़ टूट गया, मगर जब शौहर का इंतकाल हुआ तो जैसे खुदा ने सिर से आसमान ही छीन लिया। दुनिया ने सिर्फ़ मेरी हँसी देखी थी भाई, किसी ने ये नहीं देखा कि इन बच्चों को पालने के लिए मैंने अपने ज़ेवर, अपनी अना (स्वाभिमान) और अपनी खुशियाँ तक बेच दीं।”
अजीब सी बेचैनी ने वक़ार को घेर लिया। यादों का बोझ इतना बढ़ा कि वह एक रोज़ सब छोड़-छाड़ कर ज़ोया के शहर जा पहुँचे। जब उन्होंने ज़ोया के घर के दरवाज़े पर दस्तक दी, तो उनका दिल किसी स्कूल जाने वाले बच्चे की तरह धड़क रहा था। दरवाज़ा खुला और सामने वही चेहरा था, जिसे वक़्त की बेरहम लकीरों ने पूरी तरह बदल दिया था। लेकिन उन उदास आँखों की गहराई में वही पुरानी ज़ोया कहीं दफ़न थी।
अंदर बैठते ही ज़ोया का सब्र टूट गया। “वक़ार भाई, आपने देख लिया न मेरा हाल? कहाँ वो अहमद पटेल की हवेली और कहाँ यह तंगहाली!” इतना कहते ही उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला।
वक़ार साहब से यह मंज़र देखा न गया। वह संजीदगी से सोफ़े पर ज़ोया के बिल्कुल करीब बैठ गए। उन्होंने अपनी जेब से साफ़ रुमाल निकाला और निहायत नरमी से, एक पुराने हमदर्द की तरह ज़ोया के गालों पर ढलते आँसुओं को पोंछा। उन्होंने ज़ोया का कांपता हुआ हाथ थाम लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए कहा— “हौसला रखो ज़ोया। वक़्त की फ़ितरत ही बदलना है। तुम अहमद पटेल की बेटी हो, वही अहमद पटेल जिनसे पूरा इलाक़ा मशवरा लेता था। उनकी परवरिश इतनी कमज़ोर नहीं हो सकती कि तुम टूट जाओ।”
वक़ार के इन शब्दों ने जैसे ज़ोया में रूह फ़ूक दी। उसने आँसू पोंछे और एक फीकी मुस्कान के साथ वक़ार को पूरा घर दिखाने लगी। “ये देखो भाई, ये मेरे बच्चों की कामयाबियों की तस्वीरें हैं, और ये कोना… यहाँ मैंने गाँव के उस पुराने घर की कुछ निशानियाँ रखी हैं।”
फिर ज़ोया रसोई में गई और अपने हाथों से अदरक वाली कड़क चाय बनाकर लाई। चाय की चुस्कियों के साथ गुज़रा हुआ ज़माना जैसे मेज़ पर आकर बैठ गया।
“याद है वक़ार भाई,” ज़ोया ने पुरानी यादों में डूबते हुए कहा, “जब आप हमारे गाँव के स्कूल में नए-नए मुदर्रिस (शिक्षक) बनकर आए थे? मैं और मेरी सहेलियाँ जान-बूझकर आपकी क्लास के बाहर से शोर मचाते हुए गुज़रती थीं ताकि आप बाहर निकलें।”
वक़ार साहब खिलखिलाकर हँस पड़े, “बिल्कुल याद है! और मैं डस्टर हाथ में लेकर तुम्हें अहमद पटेल साहब से शिकायत करने की धमकी देता था, मगर सच तो ये है कि मैंने कभी शिकायत की ही नहीं। तुम्हारी वो शरारतें उस ख़ामोश स्कूल की जान थीं।”
घंटों बातें हुईं। स्कूल के वो नीम के पेड़, अहमद पटेल साहब का वो सफ़ेद कुर्ता और उनका रौब… सब कुछ फिर से ज़िंदा हो गया। वक़ार ने सिर्फ़ चाय पी, मगर उस चाय में यादों की मिठास और आज की मजबूरी की कड़वाहट, दोनों घुली हुई थीं। लेकिन घूमते हुए वक़ार की पारख़ी नजरों ने देख लिया कि ज़ोया के बच्चे अब अपने पैरों पर खड़े हैं, घर में सुख-सुविधाएँ भी हैं, मगर ज़ोया अब भी ख़ुद को उस ‘मजबूरी’ के लिबास में लपेटे रखना चाहती है ताकि सहारा बना रहे।
वापसी का रास्ता लंबा था और वक़ार का दिल भारी। उन्हें महसूस हुआ कि जिसे वह ‘पाक मोहब्बत’ या ‘पुरानी हमदर्दी’ का नाम दे रहे थे, वह ज़ोया के लिए अब सिर्फ़ एक आर्थिक ज़रूरत बन चुकी है। अपनी गरिमा को बचाने के लिए उन्होंने एक आख़िरी फैसला किया और घर पहुँचकर एक खत लिखा,
ज़ोया के नाम,
उम्मीद है तुम ख़ैरियत से होगी। उस दिन तुम्हारे घर से लौटने के बाद से मेरा दिल एक अजीब क़शमक़श में था। मैंने तुम्हारी आँखों में उस पुरानी ज़ोया को ढूंढने की बहुत कोशिशें की जो अहमद पटेल की हवेली की रूह थी, मगर अफ़सोस, वहाँ मुझे सिर्फ़ ज़रूरतों का एक गहरा कुआं नज़र आया।
ज़ोया, मैंने एक भाई की तरह अपना फ़र्ज़ निभाया और शायद उस पुरानी अधूरी चाहत के नाम पर भी, जो कभी मेरे दिल के किसी कोने में महफूज़ थी। लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि तुम्हारी ये माँगें हमारी उन हसीन यादों को मैला कर रही हैं। इंसान जब ज़रूरतों को रिश्तों पर हावी कर देता है, तो ताल्लुक़ की ख़ुशबू मर जाती है।
मेरी अपनी एक मुकम्मल दुनिया है, मेरी बीवी, मेरे बच्चे और मेरा वक़ार (सम्मान)। मैं अपनी बसी-बसाई गृहस्थी की कीमत पर किसी पुराने साये का पीछा नहीं कर सकता। मदद करना मेरा जज़्बा था, मगर अब दूर रहना मेरी मजबूरी है। मैं चाहता हूँ कि मेरे जहन में तुम्हारी वही तस्वीर रहे जो पाक और साफ़ थी, न कि वह चेहरा जो हर मुलाक़ात में सिर्फ़ मज़रूरत मंद नज़र आए।
दुआ है कि तुम्हारे बच्चे ही अब तुम्हारा असली सहारा बनें। खैर-अंदेश, वक़ार अहमद
वक़ार साहब ने ख़त पोस्ट किया और खिड़की के बाहर डूबते हुए सूरज को देखा। उन्हें एहसास हुआ कि इश्क़’ वाक़ई किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन उम्र का तकाज़ा यह भी है कि इंसान अपनी गरिमा को न खोने दे। उन्होंने मोबाइल उठाया और वह नंबर हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया।
गाँव तो बरसों पहले डूबा था, मगर वक़ार साहब ने उस डूबी हुई याद को आज अपने दिल से विस्थापित कर दिया था। अब वहाँ सिर्फ़ सुकून था।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
