वफ़ा,एक मुकम्मल दास्तान
वादी-ए-कश्मीर की वह शाम अपनी पूरी रानाइयों के साथ ढल रही थी। पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर जमी बर्फ़, डूबते सूरज की नारंगी किरणों से लिपटकर ऐसी लग रही थी मानो किसी ने सफ़ेद रेशम पर केसर छिड़क दिया हो। चिनार के पुराने दरख़्तों के सूखे पत्ते ज़मीन पर एक कालीन की तरह बिछे थे, और जब ठंडी हवा उनसे टकराती, तो एक अजब सी मोसीक़ी (संगीत) पैदा होती। यह वही मंज़र था जिसने बरसों पहले दो धड़कते दिलों को एक-दूसरे के क़रीब लाकर खड़ा कर दिया था।
शहर के उस पुराने डिग्री कॉलेज की फिज़ाओं में पढ़ाई के साथ-साथ अदब का माहौल भी महकता था। लाइब्रेरी की ऊँची अलमारियों के पीछे, जहाँ पुरानी किताबों की खुशबू रची-बसी थी, आर्यान और ज़ोया की पहली मुलाक़ात हुई थी। आर्यान, जिसके हाथ में हमेशा मिर्ज़ा ग़ालिब या फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का दीवान होता, और ज़ोया, जिसकी आँखों की गहराई में हज़ारों अनकहे अफ़साने छिपे थे। उनकी मोहब्बत किसी आम खेल-कूद की तरह नहीं थी, बल्कि लफ़्ज़ों और तहज़ीब के साये में परवान चढ़ी थी। वे कॉलेज के लॉन में बैठकर घंटों मुशायरों की बातें करते, एक-दूसरे की नज़्मों की कमियाँ निकालते और ज़िंदगी को शायरी के चश्मे से देखते।
मगर वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जैसे ही कॉलेज की दहलीज़ पार हुई, सामने एक जागती बेरहम दुनिया मुस्तैद खड़ी था। जैसे ही वे अपने-अपने घरों की चारदीवारी में वापस लौटे, हक़ीक़त की कड़वाहट ने उन हसीन ख़्वाबों को घेर लिया। ज़ोया के घर की पाबंदियाँ और ख़ानदानी रिवायतों की दीवारें इतनी ऊँची हो गईं कि आर्यान की आवाज़ वहाँ तक पहुँचना नामुमकिन हो गया। वहीं आर्यान, जो अब अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में था, दुनिया की नज़रों में महज़ एक ‘शायर’ बनकर रह गया था।
शुरू हुआ वह दौर जिसे ‘इम्तिहान’ कहा जाता है। वह दौर, जो रातों की बेचैनी से भरा था। आर्यान अपने कमरे की खिड़की से रात भर जलते चिराग़ की लौ को देखता और काग़ज़ों पर अपना दर्द उकेरता। उधर ज़ोया, ज़माने के डर से अपनी डायरी के पन्नों में उन ख़तों को छुपाकर रोती, जो कभी भेजे ही नहीं गए थे। समाज की बंदिशें, अपनों की बेरुख़ी और तक़दीर के खेलों ने उन्हें आज़माने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। ऐसा लगने लगा था कि यह कहानी भी उन हज़ारों अधूरी दास्तानों का हिस्सा बन जाएगी जो शुरू तो कॉलेज की कैंटीन से होती हैं मगर वक़्त की गर्द में कहीं गुम हो जाती हैं।
बरसों का यह लंबा सफ़र, जो हिज्र (जुदाई) की आग में जलते हुए गुज़रा, आख़िरकार एक मोड़ पर पहुँचा। आर्यान अब सिर्फ़ एक आशिक़ नहीं, बल्कि अदब की दुनिया का एक बड़ा नाम, “डॉ. मुश्ताक” बन चुका था, जिसकी क़लम का लोहा पूरा ज़माना मानता था। वादी की उसी सरज़मीन पर एक बहुत बड़े आलमी मुशायरे का एहतिमाम किया गया। रोशनी से जगमगाता स्टेज और हज़ारों की भीड़। उसी भीड़ के एक अंधेरे कोने में ज़ोया भी बैठी थी,अपनी वही पुरानी नज़ाकत और आँखों में वही ठहराव लिए।
जब स्टेज पर आर्यान का नाम पुकारा गया, तो पूरी महफ़िल तालियों से गूँज उठी। आर्यान ने माइक संभाला, कुछ पल ख़ामोश रहा और फ़िर अपनी वही नज़्म पढ़नी शुरू की जो उसने बरसों पहले कॉलेज के आख़िरी दिन ज़ोया के लिए लिखी थी, मगर कभी सुना नहीं पाया था,
”बिछड़ने का सबब तुझसे ये ज़माना रहा,
मगर दिल में तेरा ही इंतज़ार था तेरा रहा।
वो खेल जो तक़दीर ने भी खेले हमसे,
वफ़ा की आंच में हर खेल हमारा रहा।”
जब आर्यान की नज़रें अचानक भीड़ को चीरती हुई ज़ोया की आँखों से टकराईं, तो जैसे वक़्त की रफ़्तार थम गई। ज़ोया के चेहरे पर बरसों की तपिश आँसुओं की शक्ल में बह निकली। उस एक लम्हे में ज़माने की हर दीवार ढह गई, हर पाबंदी बेमानी हो गई। मुशायरा ख़त्म हुआ, लोग चले गए, रौशनियाँ बुझने लगीं, मगर वे दोनों वहीं सकीट से हो गए।
आर्यान धीरे से ज़ोया के पास पहुँचा। उसकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन था। उसने पूछा, “ज़ोया, क्या यह अफ़साना अब भी अधूरा ही रहेगा?”
ज़ोया ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं आर्यान, अब इस कहानी को मुकम्मल होना ही होगा। क्योंकि ज़माना चाहे कितना ही जागता रहे, मोहब्बत अपनी मंज़िल ढूँढ ही लेती है।”
वह रात गवाह थी कि अगर जज़्बों में सच्चाई और अदब की गहराई हो, तो रातों की बेचैनी एक सुहानी सुबह में बदल ही जाती है। वे दोनों, जो बरसों तक एक-दूसरे की तलाश में भटकते रहे, आख़िरकार रूहानी और जिस्मानी तौर पर एक हो गए। वादी की उन हसीन फ़िज़ाओं में एक बार फ़िर चिनार के पत्तों ने उनकी गवाही दी और यह अफ़साना हमेशा के लिए अमर हो गया।
”ज़माने के खेलों ने खूब आज़माया हमें,
मगर मोहब्बत की ज़िद ने मिलाया हमें,
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
