गीतिका- माँ
श्रम से नहीं उबरती माँ।
हर पल उद्यम करती माँ।।
निज संतति की ईश्वर जो,
नहीं किसी से डरती माँ।
पुत्री-पुत्र प्रसविनी है,
उदर – कुक्षि में धरती माँ।
माँ ममता की सुरसरिता,
पाप- ताप सब हरती माँ।
आँचल माँ का वट की छाँव,
दुःख – दारिद को छरती माँ।
उसे न कुछ भी दुर्लभ है,
धन -धान्यों से भरती माँ।
‘शुभम्’ उऋण होगा न कभी,
उर में सदा विचरती माँ।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’
