कविता

मेरा गाँव मुझे याद आता है

मेरा गाँव मुझे आज भी बहुत याद आता है
गांवों से दूर हूँ फिर भी,पास नजर आता है
माना की यहाँ पे शहरों में सारी सुविधाएं है
फिर भी मुझे जिंदगी, बेहाल नजर आता है।

गांवों में शान्ति है,मौसम बड़ा खुशगवार है
जहाँ बरगद, पीपल, की छाया शानदार है
शहरों में क्या ऐसा, सुकून मिल सकता है?
यहाँ सिर्फ और सिर्फ प्रदूषण की भरमार है।

गांवों में झुरमुट की, हरी-भरी पगडण्डियाँ है
जहाँ बाग़-बगीचे हैं,और खेतों में बालियाँ हैं
शहरों में बेतहाशा,भीड़ से भरी कोलहाल है
जहाँ मिट्टी में महक नही,जहरीली आंधियां है।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578