कविता

नींद से जागने के बाद

ऊपर से नीचे तक कसीदे गढ़ रहे हैं,
किसी को नहीं पता किस ओर बढ़ रहे हैं।
राजा दिन को रात कह रहा है,
और हम भी सिर झुकाकर वही कह रहे हैं।

दिल, जिगर, शरीर छलनी पड़ा हुआ है,
राजा का सैनिक हर घर में खड़ा हुआ है।
जो कुछ भी घर में है, बस खाते जाओ,
चरण-चाटन संग स्तुति-गान गाते जाओ।

बर्बादी में भी बदलाव का नारा गूंज रहा है,
डंका कब, कहाँ, कैसे बज रहा है—
दुनिया सारा देख रहा है।

झूठों के बाजार बड़े सजे हुए हैं,
भोले-भाले खरीददार बीच फँसे हुए हैं।

राशन तो लेना है, मगर कैसे लूँ?
झोले में आभास भरा जा रहा है,
बताओ—उसके पैसे कैसे दूँ?

भविष्य के सुनहरे खयालों के सहारे,
खाली पेट बच्चे ज़िंदगी कैसे गुज़ारें?

अरमानों की पटरी पर धड़ाधड़ दौड़ रही रेल,
किस वक्त में फँस गया हूँ मैं,
क्या चल रहा यह खेल?

जेब से छोटे लोग ऊँची बातें क्या जानें,
तवायफों के पैरों की ऊँची आवाज़ को ही
भला सच कैसे मानें?

एक दिन पता चल ही जाएगा—
क्या मिला और क्या हुआ ज़ाया।
नींद से जागने के बाद
करेंगे आराम से हिसाब,
तब समझ आएगा—
कितना खोया और क्या पाया।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554