कविता

मैं अहंकार हूं

मैं अहंकार हूं
मैं सर्वव्याप्त हूं
मैं सबके अंदर छुपकर बैठा हूं
बुद्धि,विवेक मेरे वश में है
मैं कभी गलत नहीं होता
मुझे दूसरों के विचार,राय से सख्त नफ़रत है
मैं क्रोध का प्रेमी हूं,
यूं तो युगों-युगों से
मेरे शमन की विजय गाथा गाई जाती रही है
लेकिन मैं वहीं का वहीं हूं,
बस स्वरूप बदलता रहा हूं
मेरे अनंत रूप हैं
वर्तमान दौर में
मैं नेता, मंत्री हूं
मैं जज, नौकरशाह, अधिकारी हूं
मैं उद्यमी,व्यापारी हूं
मैं डाॅक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट हूं
मैं शिक्षक, धर्मगुरु, सेलिब्रिटी हूं
मैं आम आदमी हूं
मेरे पास पद, शानो-शौकत है
मेरे पास आलीशान घर, बंगले, गाड़ी हैं
मेरे पास जमीन-जत्था, नौकर-चाकर हैं
मैं जो चाहूं, जिसे चाहूं, जब चाहूं खरीद सकता हूं
मैं सर्वशक्तिमान हूं
लेकिन ये क्या?
कैसा अंधेरा
मेरी सांसें फूल रही हैं
मुझे बचाओ…
मेरे प्राण निकल…
“तुम निमित्त-मात्र थे”
विनम्र ज्ञानी ने कहा.

— मृत्युंजय कुमार मनोज

मृत्युंजय कुमार मनोज

जन्म तिथि -3.8.1977 पेशा - सरकारी नौकरी (भारत सरकार) पता- टेकजोन-4, निराला एस्टेट ग्रेटर नोएडा (पश्चिम) उ.प.201306

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