घर-संसार
घर केवल दीवारों, छतों और द्वारों का नाम नहीं, यह तो संवेदनाओं की वह सरिता है, जिसमें स्नेह, समर्पण और विश्वास निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं।
जहाँ माँ की ममता संध्या के दीप-सी शांत ज्योति बनकर हर कोने को आलोकित करती है, और पिता का श्रम वटवृक्ष की छाया-सा समूचे परिवार को आश्वस्ति देता है।
जहाँ बच्चों की निष्कलुष हँसी प्रातःकालीन कलरव बन जीवन में मधुरता घोलती है, वहीं बड़ों के अनुभव धूप में शीतल छाँह बनकर मार्ग प्रशस्त करते हैं।
घर-संसार वह उपवन है जहाँ रिश्ते पुष्पों की भाँति खिलते हैं, त्याग उनकी सुगंध बनता है और अपनत्व उनका मधुर मकरंद।
कभी मतभेदों के मेघ भी घिरते हैं, किन्तु प्रेम का आकाश उन्हें अधिक देर ठहरने नहीं देता। संवाद की शीतल फुहार मन के समस्त ताप हर लेती है।
और जहां ऐसा नहीं होता वह घर-घर नहीं होता।
जिस घर में संस्कारों की वीणा झंकृत होती है, जहाँ वाणी में मधुरता और व्यवहार में विनम्रता होती है, वही गृह धरती पर स्वर्ग का आभास कराता है।
घर-संसार की वास्तविक संपदा धन या वैभव नहीं, अपितु परस्पर प्रेम ,विश्वास, सहयोग और आत्मीयता है। यही वे दीप हैं जो जीवन के घोर अंधकार में भी आशा का प्रकाश बनाए रखते हैं।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
