कविता

कविता

ये कौन से रास्ते पे चल पड़े हो तुम हैवान?
क्यों किसी मासूम का छिन रहे हो मुस्कान?
इंसानियत को क्यों कर रहे हो निलाम?
क्यों बेटियों को कर रहे हो बेजान?
ये बेटियां चीख चीख कर पुछ रही हैं,
कि आखिर हम जाए तो जाए कहां?
सुरक्षित नहीं रहा घर, स्कूल, आफिस और न मकान,
हर जगह हैवानियत और दरिंदो ने खोल रखी है अपनी दुकान।
अब तो मंदीरो का भी कर रहें हैं ये अपमान,
नेता भी ये सब देखकर बन रहें हैं अनजान।
क्यों नहीं मेरी सुरक्षा का कर रहें हैं इंतजाम?
कहां हैं वे लोग जो कहते थे बेटियां हैं देश की शान,
मेरी अस्मिता और आबरू की निकल रही है जान।
दरिंदो को फांसी देकर हमें दिलाओ इंसाफ ,
नहीं तो मेरी आत्मा कभी नही करेगी तुमको माफ।
आओ सब मिलकर लगाएं बस एक ही नारा,
बलात्कारियों को कुत्ते की मौत मिले
ताकि फिर न करें वो ये घिनौना करतूत दुबारा।

— मृदुल शरण

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