कविता

जन्मदिन की आत्मव्यथा

आज जीवन का एक और वर्ष
शांत स्वर में मुझसे कह गया—
मानव जन्म साधारण नहीं होता,
यह ईश्वर का अनुपम वरदान है।

अपार संभावनाओं के नभ में
हर पल उड़ान भरता है मन,
सपनों के पंख लगाकर
छू लेना चाहता है अनंत गगन।

किन्तु जन्म लेते ही मानव
उलझ जाता है संसार के जाल में,
कभी झूठ, कभी फरेब,
कभी अपनों से ही बने सवाल में।

जीवन की अंतिम मंज़िल मृत्यु है,
यह सत्य सभी जानते हैं,
फिर भी न जाने क्यों
मोह-माया में भटकते रहते हैं।

हर जन्मदिन पर मन पूछता है—
क्या पाया और क्या खोया?
कितनों को अपना बना पाया,
और कितनों से नाता खोया?

धरा पर भटकता रहा इंसान
अनजान राहों की तलाश में,
जो मिला उसे कम ही लगा
नई इच्छाओं की प्यास में।

जानता है मानव कि
खाली हाथ ही जाना है,
फिर भी जीवन भर
संसार सजाना है।

आज इस दिवस पर
बस इतना सा एहसास हुआ—
ऊँची उड़ानों से बड़ा सुख
अपनों के बीच लौट आना हुआ।

यदि प्रेम, अपनापन और सुकून मिला,
तो यही जीवन की सच्ची जीत है,
वरना सब कुछ पाकर भी
मन भीतर से अधूरा ही रहता है।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com

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