कविता

मर्द-औरत

मर्द कमावे घर पल जावे,
औरत कमावे रौब दिखावे।
जान लगी जब घर तै बाहर,
घर में फिर जी न लग पावे।

कुछ तो मजबूरी की मारी,
कमाना उनकी घनी लचारी।
बच्चों को पालन की ख़ातिर,
दिन रात काम करे बिचारी।

कुछ टैम पास करण ख़ातिर ही,
घर से बाहर घूमण ख़ातिर ही,
करें नौकरी घर काम से बच जाँ,
वे रूपै कमावें फ़ैशन ख़ातिर ही।

किट्टी क्लब पार्टी का शौक़,
नये नये सूट साड़ी का शौक़।
सहेलियों में धाक की ख़ातिर,
होटल में जा खाने का शौक़।

पति रहे चाहे उरले गाँव
वो रह लेगी परले गाँव।
पैसों की आज़ादी होगी,
नया बसा लेगी वो गाँव।

सास ससुर न ननद ही चाहवे,
रहने को घर तन्हा ही चाहवे।
सुबह की चाय दे पति बना के,
आज्ञाकारी हो ऐसा वर चाहवे।

— डॉ. अ कीर्ति वर्द्धन

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