गीत/नवगीत

भीतर बैठे भेड़िए

कॉकरोच को तुच्छ कह, भरते मन अभिमान।
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

लोमड़ जैसी चाल से, करते रोज़ शिकार,
गिरगिट जैसे रंग बदल, लेते नया किरदार।
चेहरों वाली भीड़ में, मरता अब इंसान—
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

कॉकरोच तो जीव है, रखता अपना धर्म,
मानव भीतर पालता, नफ़रत वाला कर्म।
मीठे शब्दों के तले, छिपा हुआ तूफान—
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

रिश्तों की चौपाल पर, बिकते रोज़ जमीर,
मतलब वाले लोग सब, देते गहरी पीर।
अपनों के ही हाथ से, मिलता रोज़ त्राण—
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

धर्मों की दीवार पर, लिखते झूठे ज्ञान,
सत्ता पाने के लिए, बेच रहे ईमान।
भीतर काला धुआँ है, ऊपर श्वेत विधान—
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

दर्पण जब सच बोल दे, होने लगे बवाल,
झूठे चेहरों पर नहीं, टिकता सच्चा जाल।
सौरभ कहे आदमी, पहले बने इंसान—
भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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