खामोश कदम : एक वृद्ध पिता की व्यथा-कथा
आधुनिकता की आँधी और स्वार्थ रूपी दानव ने सभी मानवीय व सामाजिक मूल्यों को तहस-नहस कर दिया है I मानव की अति स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण संबंधों के व्याकरण में बदलाव आ गया है I पिता और संतान के बीच के रिश्ते भी बाजारवाद और अर्थशास्त्र तय करने लगे हैं I माँ-बाप अपने ही घर में मिसफिट हो गए हैं I उनकी देखभाल करना तो बोझ बन ही गया है, अब तो उन्हें अपनी ही सम्पत्ति से बेदखल करने और घर से बहिष्कृत करने की घटनाएँ भी आम हो गई हैं I भारत के मध्यवर्ग के सामने यह बड़ा संकट है I भारत का मध्यवर्ग आर्थिक असुरक्षा और अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए मानवीय मूल्यों को तिलांजलि दे रहा है I मध्यवर्ग के पास संसाधनों का अभाव होता है, लेकिन उसके सपने बड़े होते हैं I भले ही उसकी आय सीमित हो, लेकिन वह विलासिता के सभी उपकरणों को हस्तगत कर लेना चाहता है I वह अपनी आर्थिक विपन्नता को छिपाने के लिए तरह-तरह के पाखंड करता है एवं आय के चोर दरवाजे की तलाश में लगा रहता है I भारत का मध्यवर्ग दूसरों की संपत्ति को प्राप्त करने के लिए लार टपकाता रहता है I लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही संबंध स्थापित करते हैं और उपयोगिता सिद्ध हो जाने के बाद संबंधों को ठोकर मार देते हैं I नाते-रिश्ते उपयोगिता के आधार पर तय होने लगे हैं I स्वार्थ और उपयोगितावाद की अंधी दौड़ में मनुष्य दानव बनता जा रहा है I मानव का इस कदर पतन चिंता का कारण होना चाहिए, लेकिन किसी को चिंता नहीं है I हिंदी के यशस्वी कथाकार रूपसिंह चंदेल का सद्यःप्रकाशित उपन्यास ‘’खामोश क़दम’’ मनुष्य के इसी क्रूर पक्ष पर आधारित है I इस औपन्यासिक कृति की भावभूमि सर्वथा नई है, लेकिन घटना असामान्य नहीं है I इस उपन्यास में पिता और उसकी संतान के बीच के रिश्ते में आए बदलाव को रेखांकित किया गया है I यह उपन्यास संवेदनहीनता और संबंधों के आर्थिक गणित की एक नई इबारत लिखता है I इस उपन्यास में टूटते जीवन मूल्यों, बिखरते परिवार, दरकते रिश्तों, शून्य होती संवेदनाओं की पड़ताल की गई है I
‘’खामोश क़दम’’ उपन्यास का शीर्षक प्रतीकात्मक है I रामस्वरूप सिंह के बच्चों ने उनके साथ षड्यंत्र कर उन्हें अपने ही घर से बाहर निकाल दिया I ऐसी स्थिति में व्यक्ति खामोश रहने के सिवा कर ही क्या सकता है ? इस उपन्यास में भारत के मध्यवर्ग की विडम्बनाओं, दुर्बलताओं और महत्वाकांक्षाओं का प्रभावशाली चित्रण किया गया है I उपन्यास की कथावस्तु सीधी-सपाट है और इसमें अवांतर कथाएँ बहुत कम हैं I यह चिंतन का विषय है कि निम्न मध्यवर्ग से उच्च मध्यवर्ग की विकास-यात्रा में व्यक्ति का इतना पतन हो जाता है कि वह अपने पिता के खिलाफ षड्यंत्र कर उसे सड़क पर धकेल देता है I यह आधुनिकता नहीं, बल्कि पैशाचिक प्रवृत्ति है I इस उपन्यास में भारत की नौकरशाही, दहेज़ प्रथा, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मध्यवर्गीय अहंकार, तलाक की समस्या और अंग्रेजी मानसिकता पर भी कशाघात किया गया है, लेकिन संबंधों के निष्प्राण हो जाने की मर्मस्पर्शी व्यथा उपन्यास का मुख्य स्वर है I इस उपन्यास में समकालीन जीवन-जगत के संत्रास, घुटन और बेहयाई का प्रभावशाली रेखांकन किया गया है I ‘’खामोश क़दम’’ एक वृद्ध पिता की पीड़ा और त्रासदी का दस्तावेज है I उपन्यासकार ने इसमें रिश्तों की टूटन को रेखांकित करने के लिए रोचक कथा का तानाबाना बुना है जो अंत तक पाठकों को बाँधकर रखती है I उपन्यास का नायक रामस्वरूप है जिसके बेटी-दामाद और पुत्र-पुत्रवधू मिलकर उसे अपने ही घर से बाहर निकल जाने के लिए विवश कर देते हैं I जीवन की अंतिम बेला में खामोश रहना उनकी नियति है I वृद्ध और बीमार पिता कुछ कर भी नहीं सकता I रामस्वरूप ने तिनका-तिनका जोड़कर उस घर का निर्माण किया था I अपने घर से बेघर होने की यह व्यथा-कथा अत्यंत मार्मिक है I घर में वृद्धों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है I वे हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं I परिजनों द्वारा वृद्धों की निरंतर उपेक्षा की जाती है I बुढ़ापा भार बन गया है I पिता अपने पुत्रों के सुख के लिए अपना यौवन होम कर देते हैं, लेकिन उनकी संतान ही उन्हें अपने घर से बेदखल कर देती है I भारतीय मनीषा में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवताः’ का उद्घोष कर नारी शक्ति की महत्ता प्रतिपादित की गई है, लेकिन नारी जब रामस्वरूप की बेटी सरोजनी जैसी हो तो उसे विषकन्या की ही संज्ञा दी जा सकती है I
भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख यक्ष प्रश्न यह है कि अच्छे लोग राजनीति में शामिल क्यों नहीं होते I राजनीति उन लोगों की शरणस्थली बन गई है जो दुर्जन, झूठे और अपराधी हैं I यह संसदीय लोकतंत्र का कैसा मजाक है कि राजनैतिक दल टिकट बेंचते हैं और जनता जाति, धर्म और लोकलुभावन नारों के आधार पर वोट देती है I जनता शराब, पैसे और मुफ्त राशन-पानी के लोभ में वैसे उम्मीदवारों को भी अपना भाग्यविधाता चुन लेती है जिनके हाथ खून से रंगे होते हैं I भारत का लोकतंत्र धनपशुओं का चरागाह बन गया है I राजनैतिक दलों ने लोकतंत्र को कैद कर लिया है I नेताओं और पार्टियों का मुख्य ध्येय वोट लेना और सत्ता सुख भोगना मात्र रह गया है I इस उपन्यास में लोकतंत्र की विद्रूपताओं पर निर्मम प्रहार किया गया है I भारत में नेता, पुलिस और नौकरशाह का गठबंधन जगजाहिर है I इनके गठजोड़ से हड़ताली मजदूरों को जलाकर मार दिया जाता है I थाने का सिपाही बुदबुदाते हुए सच का बयान करता है-‘’यूनियन वालों के साथ हुई बातचीत को रात थानेदार साहब को नेताजी ने बताया था I ये स्साले नेता लोग दिखावे के लिए मजदूरों के साथ होने, उनके हित में होने के बारे में भाषण देते हैं, सच में ये केवल पूंजीपतियों के साथ होते हैं I उनके हित देखते हैं I बिना नेताजी की सहमति के मालिक ने गुंडे नहीं भेजे होंगे……मरनेवाले मर गए I फायर ब्रिगेड भी तब पहुंचेगा जब आग शांत हो चुकी होगी, लेकिन बताना तो पड़ेगा ही I’’ भारत में प्रशासन के नाम पर नाटक ही चलता है I यहाँ सब कुछ रामभरोसे चल रहा है I
इस उपन्यास में अन्य अनेक समस्याओं की भी पड़ताल की गई है I इसमें चिकित्सा व्यवस्था, दहेज़ प्रथा, लचर कानून-व्यवस्था, लुंजपुंज प्रशासनतंत्र आदि पर प्रहार किया गया है I इसमें मेडिकल क्षेत्र के भ्रष्टाचार और लूटतंत्र को भी बेपर्दा किया गया है I चिकित्सा क्षेत्र में टेस्ट के नाम पर कमीशन का खेल चलता है I सब कुछ जानते हुए भी गरीब मरीज कमीशन देने के लिए विवश हैं I यहाँ मरीजों का हर प्रकार से शोषण किया जाता है I फाइव स्टार हॉस्पिटल शोषण के भयानक केंद्र में तब्दील हो चुके हैं I दहेज़ प्रथा के कारण भारत में अनेक परिवार तबाह हो जाते हैं I दहेज़ को रोकने के लिए सरकार ने कानून बनाए हैं, लेकिन दहेजलोभियों पर इस कानून का कोई असर नहीं होता है I उपन्यास में दहेज़ विरोधी कानून से उत्पन्न पारिवारिक संकट एवं विद्रूपताओं का बेबाक चित्रण किया गया है I शादी को जुआ कहा जाता है I लड़की और लड़का दोनों के लिए शादी एक जुआ है I यदि जोड़ी अनुकूल हुई तो स्वर्ग अन्यथा कलह, झगडे, तलाक और जीते जी नरक का सामना I दहेज़ प्रथा की जड़ों को मजबूत करने के लिए कन्या पक्ष भी उत्तरदायी है I अनेक लड़केवाले बिना दहेज़ के शादी करना चाहते हैं, लेकिन लड़कीवाले की महत्वाकांक्षा एवं प्रदर्शनप्रियता के कारण ऐसा नहीं हो पाता है I नौकरशाही का दीमक देश को खोखला कर रहा है I स्वतंत्र होने के बाद भी व्यवस्था यथावत चल रही है I गुलाम भारत और आज़ाद भारत में अधिक फर्क नहीं है I उपन्यास के नायक रामप्रकाश ने देश की दुर्दशा के बारे में कहा-‘’देश की आज़ादी का आनंद तीन वर्ग के लोग ही उठा रहे हैं I नेता, पूंजीपति और ब्यूरोक्रेट्स I कल तक जो छोटे-बड़े राजा थे, जमींदार थे और उनके जो सिपहसालार थे वे आज नेता हैं I आज़ादी को मैं सत्ता हस्तांतरण मानता हूँ I कुछ नहीं बदला I लोग वैसे ही गरीब हैं I गरीबी हटाने का केवल नारा दिया गया, गरीबी बढ़ी I अमीर अमीर होते गए I नेता, पूंजीपति और ब्यूरोक्रेट्स का गुप्त गठबंधन है I’’
‘’खामोश क़दम’’ उपन्यास एक वृद्ध पिता की व्यथा का करुण आख्यान है I इसमें आधुनिक जीवन की विकृति और एक पिता की बेचारगी का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है I भारत में ऐसे लाखों रामप्रकाश हैं जो दर-दर की ठोकरें खाने के लिए अभिशप्त हैं I इसमें अत्याधुनिक मानव के विद्रूप चेहरे को उजागर किया गया है जो आत्मकेंद्रित, विलासी, परम स्वार्थी और संवेदनहीन है I यह उपन्यास नहीं, एक आईना है जिसमें भारत का तथाकथित सभ्य नागरिक अपना विद्रूप चेहरा देख सकता है I उपन्यास की भाषा सहज–सरल और शैली बोधगम्य है I कथा में प्रवाह ‘’खामोश क़दम’’ का विशेष गुण है I
पुस्तक-खामोश कदम (उपन्यास)
लेखक-रूपसिंह चंदेल
प्रकाशक-अमन प्रकाशन, कानपुर
वर्ष-2026
पृष्ठ-112
मूल्य-275/-
