कविता- अब खुद को समझना सीख गई हूँ
पहले हर बात दिल पर लेती थी,
छोटी-सी बात में क्रोधित-सी होती थी,
लोगों के शब्दों के अर्थ ढूंढती थी,
फिर भी संतुष्ट नहीं होती थी।
अपनापन पाने को तरसती थी,
हर मुस्कान में सच्चाई ढूंढती थी,
झूठे वादों के झूठे झांसों में आकर,
अपने मन को खुश करलेती थी।
अब थोड़ा संभलना सीख गई हूँ,
खुद में ही खुशियां ढूंढ लेती हूँ,
अपनापन पाने की चाह छोड़ दी,
अच्छाई की तारीफ से अपना बना लेती हूँ।
मुस्कुराती हूँ अब विपरीत समय में भी,
व्यथा में भी सहज कथा बुन लेती हूँ,
पहले हर बात दिल पर लेती थी,
अब खुद को समझना सीख गई हूँ।
— लीला तिवानी
