पर्यावरण

शहरी पर्यावरण कवच: वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता

शहरीकरण आधुनिक सभ्यता के विकास की सबसे प्रमुख विशेषता बन चुका है। यह आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विस्तार, रोजगार सृजन और तकनीकी उन्नति का प्रतीक माना जाता है। किंतु जब यह शहरीकरण तीव्र, अनियोजित और असंतुलित रूप में आगे बढ़ता है, तो यह पर्यावरणीय संकटों को जन्म देता है। भारत जैसे विकासशील देश में शहरीकरण की गति अत्यंत तीव्र रही है, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन, औद्योगिक केंद्रों का विस्तार और महानगरों की ओर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि शहर केवल विकास के केंद्र नहीं रहे, बल्कि पर्यावरणीय तनाव के भी केंद्र बनते जा रहे हैं। इसी संदर्भ में शहरी पर्यावरण कवच की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, जो शहरी क्षेत्रों को पर्यावरणीय क्षरण से बचाने के लिए एक समग्र, बहुस्तरीय और सतत सुरक्षा प्रणाली के रूप में कार्य करती है।

भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद विशेष रूप से तेज हुई है। औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र का विस्तार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता तथा बेहतर जीवन स्तर की आकांक्षा ने ग्रामीण जनसंख्या को शहरों की ओर आकर्षित किया है। इसके परिणामस्वरूप महानगरों और बड़े शहरों की जनसंख्या क्षमता से अधिक हो गई है। यह स्थिति केवल जनसंख्या वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरी अवसंरचना, संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर दबाव डालती है। अनियोजित शहरी विस्तार के कारण कृषि भूमि, वन क्षेत्र और जल निकायों का तेजी से अतिक्रमण हुआ है, जिससे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हुआ है।

शहरी पर्यावरण का सबसे गंभीर संकट वायु प्रदूषण के रूप में सामने आया है। वाहनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआँ, निर्माण गतिविधियों से उत्पन्न धूल और ऊर्जा उत्पादन के पारंपरिक स्रोतों के उपयोग ने शहरी वायु को अत्यंत विषाक्त बना दिया है। सूक्ष्म कण पदार्थ जैसे PM 2.5 और PM 10 मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इसके कारण श्वसन संबंधी रोग, हृदय रोग, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। वायु प्रदूषण केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह जीवन की गुणवत्ता और उत्पादकता दोनों को प्रभावित करता है।

जल संकट भी शहरी पर्यावरणीय असंतुलन का एक प्रमुख पहलू है। शहरों में जल की मांग अत्यधिक बढ़ चुकी है, जबकि जल संसाधनों का पुनर्भरण और संरक्षण उस अनुपात में नहीं हो पा रहा है। भूजल का अत्यधिक दोहन, वर्षा जल संचयन की कमी और प्राकृतिक जल निकायों का अतिक्रमण स्थिति को गंभीर बना रहे हैं। कई शहरों में जल आपूर्ति और मांग के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में गंभीर संकट की संभावना बन रही है।

शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती है। कचरे की बढ़ती मात्रा और उसके वैज्ञानिक निपटान की अपर्याप्त व्यवस्था पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। प्लास्टिक अपशिष्ट विशेष रूप से भूमि, जल और जैव विविधता के लिए खतरा बन चुका है। खुले डंपिंग यार्ड और अपर्याप्त प्रसंस्करण प्रणाली प्रदूषण को और बढ़ाते हैं।

शहरी तापमान में वृद्धि, जिसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है, भी एक गंभीर समस्या है। कंक्रीट संरचनाओं की अधिकता और हरित क्षेत्रों की कमी के कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहता है। इससे ऊर्जा खपत बढ़ती है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

जैव विविधता का ह्रास भी शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण परिणाम है। प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से पक्षियों, कीटों और अन्य जीवों की संख्या में गिरावट आ रही है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है।

इन सभी समस्याओं का समाधान शहरी पर्यावरण कवच की अवधारणा में निहित है, जो शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है। इसमें हरित अवसंरचना, जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा और नागरिक सहभागिता जैसे तत्व शामिल हैं। शहरी वनों, पार्कों और ग्रीन कॉरिडोर का विकास पर्यावरण सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सरकारी स्तर पर स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसे प्रयास शहरी पर्यावरण सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। हालांकि, इनका प्रभावी क्रियान्वयन ही वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।

नागरिक सहभागिता भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। जल और ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग, कचरे का पृथक्करण और वृक्षारोपण जैसी गतिविधियाँ इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि शहरीकरण विकास का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन यदि इसे पर्यावरणीय संतुलन के बिना आगे बढ़ाया गया तो यह गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है। इसलिए शहरी पर्यावरण कवच आज की ही नहीं बल्कि भविष्य की भी अनिवार्य आवश्यकता है।

— डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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