नैराश्य क्या है
चिंतन से चित्त हो अशांत
मन रहने लगे क्लांत
एकाकीपन रास आने लगे
रातें लंबी हो डराने लगे
हर आहट पर मन घबराने लगे
कुंठा मन में पैर पसार रही
हां हां समय रहते चेत जाओ ।
प्रकृति से फूलों से अपनों से
अपनी कला से अपनी खुशियों से
नेह बढ़ाओ, जीवन में आने वाले
नैराश्य को समय रहते दूर भगाओ ।
दिल चाहता है,सुनो दिल की बात
खुश रहने के संसाधनों को ढूंढ लो
अपनी खुशियों की चाभी पास रखो
किसी के हाथों खुशियों की चाभी ना दो ।
मानव जन्म है सबसे ऊपर
असंख्य सपने और संसाधनों का भंवर
कहीं तो मन रम जायेगा
कला संगीत चित्रकारी हो या
बागवानी, मन के तारों को छेड़
वह गीत फिर से गुनगुनायेगा ।
नैराश्य को दूर भगा कर पुनः मुस्कूरायेगा ।
— आरती रॉय
