कविता

मयूरा

रे मयूरा !
नाच के दिखा l
क्यों है खड़ा तू परेशान सा?

रे मानव!
नाचूँ मैं कैसे?
ना जंगल, ना बदरा
ना हरियाली, ना वर्षा l
पथरीली जमीन
सीमेंट की छतें l
ना दाना ,ना पानी ,
तुझे क्या है चिंता?
मेरी क्या है परेशानी ?

तेरे एसी हीटर ने
गर्मी बढ़ा दी
पर्यावरण बदलकर
हमारी तादाद घटा दी l
बदल रहा पंखों का रंग
फीका पड़ गया है l
नहीं दिखते आँसू ,
न दिखता दुखी मन l
अकेला खड़ा मैं l
बता कैसे नाचूँ?

रे मानव!
तू ही बता कैसे नाचूँ ?

— बृज बाला दौलतानी

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