ग़ज़ल
टूटने के कगार पर है ये
दिल रहे शाद यार पर है ये
इक यही पेड़ है कि सूख रहा
जबकि बगिया बहार पर है ये
ज़िंदगी ख़त्म मत करो मेरी
ले रही साँस प्यार पर है ये
आज भी क्यों मलिन-मलिन हम हैं
जबकि दुनिया निखार पर है ये
छोड़ देगा डरो अभी से मत
साथ तो एतबार पर है ये
मिल रहे रुख़ हसीन राही को
ठीक ही रहगुज़ार पर है ये
क्या करूँ फिर नहीं निभाना जब
दाग़ पिछले क़रार पर है ये
— केशव शरण
