ग़ज़ल
दिल चाहता है अब न कानों में शोर हो
रफ़्तार जिंदगी की थोड़ी और जोर हो
पतंग सी ख्वाहिश गर आसमां पे हो
तो खुदाया नासमझ के हाथों न डोर हो।
लुटा दी जिंदगी हुआ कुछ भी न हासिल
दो दिन की जिंदगी में जीतने का दौर हो।
डूबते सूरज को देख आंखें हुईं वीरान
दिल चाहे नया गुल खिले एक नई भोर हो।
हम देखकर वीरान खंडहरों को रो पड़े
शायद ये मेरी जिंदगी का आखिरी छोर हो।
तुम भी हंसो हम भी हंसें है दो दिन की जिंदगी
इस दर्द को छोड़ो,जानिब,चलो कोई बात और हो।
— पावनी
