कलम
कलम तुम्हारी जो ताकत है
वह एक वीर पुरुष की तरह
रण में योध्दा की तरह
सत्य के लिए लड़ती हो
उन गरीबों तथा असहायों के लिए
उनकी आवाज बनती हो
उनकी एक ताकत होती
थकती नहीं हो
यही तुम्हारी ताकत है
निर्भय होकर
सरकारों से लड़ती हो
हे कलम! तुम्हारी जय-जयकार
तुम न होती तो
कितनी लाशें बिछ जाती
जीवन के सतरंगी रूपों में
तुम हंसती रहती हो
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
