शब्द से सेवा तक डाक्टर’ का सफ़र और उसका महत्व
‘डाक्टर’ का सफ़र और उसका महत्व। आधुनिक समाज में ‘डाक्टर’ एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही हमारे मन में सफ़ेद कोट पहने, गले में स्टेथस्कोप लटकाए और मरीजों का इलाज करते एक संवेदनशील व्यक्ति की छवि उभरती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द की शुरुआत चिकित्सा से नहीं, बल्कि शिक्षा और ज्ञान से हुई थी। ‘डाक्टर’ कोई संक्षिप्त रूप (फुल फॉर्म) नहीं है, बल्कि यह खुद में एक मूल शब्द है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘डोसेरे’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है—”सिखाना” या “शिक्षक”। मध्यकाल में यूरोप के विश्वविद्यालयों में यह उपाधि उन विद्वानों को दी जाती थी जो अपने विषय जैसे दर्शनशास्त्र, कानून या धर्मशास्त्र में पारंगत होते थे और दूसरों को पढ़ाने की योग्यता रखते थे, इसीलिए आज भी शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोच्च डिग्री हासिल करने वालों को पीएच.डी. (डाक्टर ऑफ फिलॉसफी) कहा जाता है। समय के साथ, चिकित्सा के क्षेत्र में शोध करने वाले और मानव शरीर का उपचार करने वाले विद्वानों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होने लगा और धीरे-धीरे यह शब्द पूरी तरह से वैद्यों, हकीमों और सर्जनों के लिए आरक्षित सा हो गया, जिसके अंतर्गत आज मुख्य डिग्रियां जैसे एमबीबीएस, एमडी, एमएस, बीडीएस, बीएएमएस और बीएचएमएस बी एन वाय एस आती हैं। भारतीय संस्कृति और वैश्विक समाज में डाक्टरों को ‘धरती पर भगवान का रूप’ माना गया है क्योंकि जब कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी या जीवन-मरण के संकट से जूझ रहा होता है, तब डाक्टर अपनी सूझबूझ और मेहनत से उसे नया जीवन प्रदान करते हैं। वे रात हो या दिन, महामारी का दौर हो या युद्ध की स्थिति, अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की निःस्वार्थ सेवा में डटे रहते हैं और एक अच्छा डाक्टर केवल दवाओं से नहीं, बल्कि अपने मीठे बोल और संवेदनशीलता से मरीज़ का आधा दर्द दूर कर देता है। यदि आज के संदर्भ में हम डाक्टर शब्द के हर एक अक्षर को उनकी खूबियों के आधार पर एक प्रतीकात्मक अर्थ दें, तो ‘डी’ से डेडीकेटेड (समर्पित), ‘ओ’ से ओबीडियंट (कर्तव्यनिष्ठ), ‘सी’ से कम्पैशनेट (सहानुभूति रखने वाले), ‘टी’ से टॉलरेंट (सहनशील), ‘ओ’ से ऑप्टिमिस्टिक (आशावादी) और ‘आर’ से रिस्पेक्टेबल (आदरणीय) बनता है। अंततः ‘डाक्टर’ महज़ एक पेशेवर उपाधि या नाम के आगे लगने वाला टैग नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी, त्याग और तपस्या का नाम है,
चाहे वह ज्ञान बांटने वाला शिक्षक हो या जीवन बचाने वाला चिकित्सक,दोनों ही समाज को अंधकार और कष्टों से बाहर निकालने का काम करते हैं और यही कारण है कि सदियों से यह शब्द दुनिया के सबसे गरिमामय और सम्मानित संबोधनों में से एक बना हुआ है।
— डॉ. रिज़वाना खान
