कविता

दीवारों के कान होते हैं

सुना था, दीवारों के कान होते हैं,
मगर अब तो दीवारें ही नहीं हैं।
दीवारें नहीं हैं शर्म की,
दीवारें नहीं हैं अब हया की,
दीवारें नहीं बचीं मर्यादा की।

अब व्यक्ति हर स्तर से गुजरता है,
वह रोज़ गिरता है,
मगर अपने मन में वह रोज़ उठता है।
एक दिन वह उस मुकाम को भी पा लेता है,
जिसको और भी पाने वाले होते हैं।

वे उसे प्रतिष्ठित करते हैं,
समाज की मौलिक ज़िम्मेदारियाँ देते हैं।
वह उन ज़िम्मेदारियों को ज़िम्मेदारी नहीं,
अपनी इज़्ज़त समझ बैठता है,
और उसी की मगरूरी में वह
गिरता और गिरता चला जाता है।
इसीलिए, पुष्कर, यह कहा जा सकता है कि
दीवारें अब नहीं बचीं।।

— पुष्कर तिवारी

पुष्कर तिवारी

पिता का नाम_ श्री नागेंद्र नाथ तिवारी ( अध्यापक) माता का नाम _श्रीमती निर्मला तिवारी( सहायक बाल विकास परियोजना अधिकारी ) ग्राम पोस्ट _डुमवालिया तहसील _सलेमपुर जिला। _ देवरिया मोबाइल नंबर _ 9651112606 Princepushkar91@gmail.com

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