जप, तप, नाम, व्रत
जप, तप, नाम, व्रत, परमार्थ
सब बेकार से लगते हैं।
झूठ, कपट, आँसू, द्वेष, काम
सब साकार से लगते हैं।
जब जीवन के झंझावात
चरमोत्कर्ष पर होते हैं,
तब खुद के भगवान भी
पत्थर से लगते हैं।
मैंने माँ की मूरत में देखे,
पिता की सूरत में देखे,
आस्था की नाव पर बैठकर
मैंने उन्हें जीवन के
हर कठिन ठाँव पर देखे।
मगर फिर भी दिल मजबूर-सा है,
परिस्थिति का नासूर-सा है।
समझाता हूँ, कोई है
सबको देखने वाला,
मगर वह तो अपने सुरूर में है।
ईश्वर के अंश,
इक्ष्वाकु के वंश,
हम तुम्हें शीश झुकाते हैं।
मुझे पता है, तू है,
इसलिए, पुष्कर, तुम्हें
दिल में बसाते हैं।।
— पुष्कर तिवारी
