दीवारों के कान होते हैं
सुना था, दीवारों के कान होते हैं,
मगर अब तो दीवारें ही नहीं हैं।
दीवारें नहीं हैं शर्म की,
दीवारें नहीं हैं अब हया की,
दीवारें नहीं बचीं मर्यादा की।
अब व्यक्ति हर स्तर से गुजरता है,
वह रोज़ गिरता है,
मगर अपने मन में वह रोज़ उठता है।
एक दिन वह उस मुकाम को भी पा लेता है,
जिसको और भी पाने वाले होते हैं।
वे उसे प्रतिष्ठित करते हैं,
समाज की मौलिक ज़िम्मेदारियाँ देते हैं।
वह उन ज़िम्मेदारियों को ज़िम्मेदारी नहीं,
अपनी इज़्ज़त समझ बैठता है,
और उसी की मगरूरी में वह
गिरता और गिरता चला जाता है।
इसीलिए, पुष्कर, यह कहा जा सकता है कि
दीवारें अब नहीं बचीं।।
— पुष्कर तिवारी
