कविता

धूम-धड़ाम

लो जी लो मानसून आया
बादलों ने आसमान में डेरा जमाया
झूम-झूम कर धरती लहराई
आशाओं- उमंगों ने भरी अंगड़ाई।

तपती गर्मी से मिली सबको राहत
अब नही तुझसे मुझे कोई शिकायत
पानी के संकट से मिला छुटकारा
प्यासा न मरेगा अब पशु आवारा ।

क्या हुआ जो थोड़ी सी देर लगाई
चार दिन में पूरी कर दी भरपाई
अब और अधिक न कर तू मनमानी
मुम्बई हो गया पानी -पानी।

स्कूल- कालेज तक बन्द हो गये
लोग घरों में नजरबंद हो गये
सड़कों पर लग गया है भारी जाम
चार दिनों में ही मच गया कोहराम।

बड़े-बड़े पेड़ जमींदोज हो गये
दरकी इमारतों में कुछ सपने खो गये
सड़कों में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क
हुक्मरानों को भला इससे क्या फरक

दो- चार दिन बाद फिर बरस लेना
बस इतना भर है मुझे तुमसे कहना
अभी ले लो थोड़े दिन का विश्राम
बाद में फिर कर लेना धूम-धड़ाम ।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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