हास्य व्यंग्य

चुनांचे चुनाव ख़त्म ही क्यों होते हैं यार

चुनाव संपन्न हो चुके थे। लोकतंत्र का महाकुंभ अब “रिज़ल्ट दर्शन” की साधना में लीन था। टिकड़मों की ढोलक बज चुकी थी, नारों की नगाड़ेबाज़ी थककर कोने में पड़ी थी, और कार्यकर्ताओं की बैटरियाँ,जो कभी फुल चार्ज थीं,अब “लो पावर मोड” में आ चुकी थीं। जोश का जो नींबू था, उसे इतना निचोड़ा गया कि अब छिलके भी पानी माँग रहे थे।

इधर नेताजी अपने दरबार में विराजमान थे,चारों ओर हवाइयाँ उड़ रही थीं, जैसे मानसून आने से पहले आसमान अपनी प्रैक्टिस कर रहा हो। चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरकर नेताजी के चेहरे को बीभत्स बना रही थीं। कुर्सी को उन्होंने ऐसे जकड़ रखा था जैसे बच्चा अपनी टॉफ़ी को पकड़कर बैठता है कि कोई दूसरा बच्चा उससे छीन न ले।

पास ही कुछ चुने हुए चाटुकार बैठे थे,लोकतंत्र के असली एम्बुलेंस कर्मी मान लीजिए इन्हें। उनका काम होता है नेताजी की गिरती हुई हिम्मत को कृत्रिम साँस देना। “सर, सर्वे-वरवे सब बिकाऊ होते हैं… असली सर्वे तो जनता के दिल में होता है, है कि नहीं? और जनता के दिल अपने गिरवी रख छोड़े हैं!”

दूसरे कार्यकर्ता ने भी चाटुकारिता की चटनी से सना अपना दाँव फेंका, “आप चिंता न करें, ईवीएम इस बार बहुत संस्कारी है… आज्ञाकारी है… वही करेगी जो आपने सिखाया है।”

नेताजी ने एक गहरी साँस ली, फिर टीवी की ओर घूरते हुए बोले, “ये सर्वे वाले तो ससुरे हमारी कुंडली बिगाड़ने पर तुले हैं। हर चैनल पर हमारी हार का योग बना रहे हैं। कहीं ये चुनावी पंडित विपक्ष के रिश्तेदार तो नहीं हैं ससुरे?”

टीवी पर एंकर चीख-चीखकर बता रहा था, “एग्ज़िट पोल में बड़ा उलटफेर!”

नेताजी के चेहरे का भाव कुछ-कुछ ऐसा हो गया जैसे बच्चे का परीक्षा परिणाम देखते समय होता है,“कहीं इस बार भी नंबर कम तो नहीं आ गए?”

उधर पार्टी ऑफिस में “चिंतन-मनन-मंथन” की त्रिवेणी बहने लगी थी। हार की स्थिति में किसे बलि का बकरा बनाया जाए, इसकी सूची तैयार हो रही थी। एक वरिष्ठ नेता सुझाव दे रहे थे, “इस बार हार का ठीकरा ईवीएम पर ही फोड़ देते हैं… पुराना नुस्खा है, पर हर बार अच्छा ही चला है।”

दूसरे ने टोका, “नहीं-नहीं, इस बार थोड़ा इनोवेशन लाना पड़ेगा… जनता भी अब सयानी हो गई है। पुराने जुमलों पर हम पर हँसने लगी है।”

नेताजी बीच-बीच में अपने आपको चिंतन की परम मुद्रा में लाने को आँखें बंद कर, कुर्सी को और कसकर पकड़ते हुए बुदबुदाते, “चार मई के बाद गंगा नहाऊँगा… माँ ने बुलाया तो है, पर अभी धारा बहुत तेज है। कहीं बह गया तो चेलों-चपाटों का क्या होगा?”

उनके इस “संन्यासी-प्रवचन” को सुनकर चाटुकारों ने तुरंत ताली बजाई, “वाह सर! क्या त्याग है… आप तो साक्षात आधुनिक वाल्मीकि हैं,डकैत से महर्षि बनने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं!”

नेताजी ने एक पैर पर खड़े होकर योगासन की कोशिश की, पर जैसे सत्ता का संतुलन डगमगाया उसी प्रकार उनका संतुलन भी डगमा गया। तुरंत कुर्सी को फिर से थाम लिया,
“अभी संन्यास का समय नहीं है… ये कुर्सी मुझे जाने नहीं देगी।”

इधर रिपोर्ट्स आ रही थीं कि इस बार “हिंसा भी मनमुताबिक नहीं हो पाई।”

नेताजी ने खीझकर कहा, “ये सरकार भी न… हर बार हमारे प्लान में बाधा डाल देती है। धनबल, बाहुबल सब पस्त हो गया… अब सिर्फ़ भाग्यबल ही बचा है।”

टीवी पर एक और सर्वे कोढ़ में खाज की तरह चमका, नतीजे और भी निराशाजनक।

नेताजी का धैर्य जवाब दे गया, “बंद करो ये सब! ये सर्वे वाले देशद्रोही हैं… अगली बार इन्हें ही चुनाव लड़वा देंगे, तब पता चलेगा!”

कुर्सी को और कसकर पकड़ते हुए उन्होंने अंतिम घोषणा की, “मैं तो बस 140 करोड़ भाई-बहनों के लिए करता हूँ… मेरा क्या है, किसी दिन झोला उठाऊँगा और चल दूँगा…”

इतना कहते-कहते उनकी निगाह फिर से कुर्सी पर टिक गई। झोला उठाने की बात में जो हल्कापन था, वह सेकंड भर में उड़ गया। कहीं वे खुद ही इस बात के साथ न उड़ जाएँ, इसलिए कुर्सी को और कसकर पकड़ लिया।

वो थोड़ी देर अपनी आँखें सिकोड़कर गम्भीर विचार करते रहे। फिर उनके मुख से स्वर फूटा, “ये चुनाव ख़त्म ही क्यों होते हैं यार… ताकि हार-जीत का फैसला हो ही नहीं। हम कोई काम न करें, सिर्फ़ और सिर्फ़ चुनाव ही लड़ते रहें… तो भी जनता के खून पसीनो की कमाई  से अच्छी चांदी काटी जा सकती है  l 

-– डॉ. मुकेश असीमित

डॉ. मुकेश 'असीमित'

पता -डॉ मुकेश गर्ग गर्ग हॉस्पिटल ,स्टेशन रोड गंगापुर सिटी राजस्थान पिन कॉड ३२२२०१ पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, लेख, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित पुस्तक "नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक" (किताबगंज प्रकाशन से ) "गिरने में क्या हर्ज है " -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन ) किताबगंज प्रकाशन से देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन अवार्ड

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