यत्र तत्र सर्वत्र
यत्र तत्र,
जीवन की धुन,
प्रकृति गाए।
शीतल पवन,
पत्तों की भाषा,
मन मुस्काए।
नीला गगन,
उड़ते पंछी,
स्वप्न सजाएँ।
ओस की बूँद,
सूरज की किरण,
मोती बन जाए।
नदी का जल,
कल-कल गान,
हृदय बहाए।
यत्र तत्र,
प्रेम की सुगंध,
जग महकाए।
यत्र तत्र,
सत्य की ज्योति,
पथ दिखलाए।
सर्वत्र बस,
मानवता खिले,
विश्व मुस्काए।
— डॉ. अशोक
