अबकी सावन में
राह निहारूँ मैं साजन की, अबकी सावन में
इत उत बरसो बदरा जाकर, अबकी सावन में।
बहुत दिनों के बाद सजन, अबकी घर आयेंगे,
फिर ख़ूब बरसना जा न पायें, अबकी सावन में।
विरह वेदना में वर्षों से, तप्त धरा सी सुलग रही,
तप्त धरा की अगन बुझा दो, अबकी सावन में।
बंजर धरती सी तरस रही हूँ, बारिश की ख़ातिर,
पुष्प खिला दो जल बरसा कर, अबकी सावन में।
— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन
