शिक्षा एवं व्यवसाय

शिक्षा पर पहरा नहीं, समान अवसर का सवेरा चाहिए

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि, ऊँची इमारतों या आधुनिक तकनीक से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, वंचित और उपेक्षित नागरिकों को कितना सम्मान, सुरक्षा और अवसर प्रदान करता है। यदि समाज का कोई वर्ग आज भी शिक्षा, गरिमा और समान अवसरों से वंचित रह जाता है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के समक्ष एक गंभीर चुनौती है।

बिहार सहित देश के अनेक क्षेत्रों में आज भी सामाजिक और आर्थिक विषमताएँ अनेक परिवारों की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और शिक्षा का अधिकार दिया है, किंतु इन अधिकारों का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुँचाना आज भी हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है। शिक्षा किसी वर्ग विशेष का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे का जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार है। जिस समाज में शिक्षा के द्वार सभी के लिए समान रूप से खुले होते हैं, वही समाज स्थायी विकास और सामाजिक सौहार्द की दिशा में आगे बढ़ता है।

स्वतंत्रता प्राप्त किए सात दशक से अधिक समय बीत चुका है। हमने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आधारभूत संरचना और वैश्विक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। फिर भी यदि समाज का अंतिम व्यक्ति भय, भेदभाव, अशिक्षा या अवसरों की कमी से संघर्ष कर रहा है, तो यह आत्ममंथन का विषय है। लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि न्याय, समान अवसर और संवैधानिक अधिकार समाज के प्रत्येक नागरिक तक कितनी ईमानदारी से पहुँच रहे हैं।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में समाज के प्रत्येक वर्ग की समस्याओं पर निष्पक्ष, संवेदनशील और तथ्यपरक विमर्श होना आवश्यक है। किसी भी प्रकार का भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार या अवसरों में असमानता न केवल संविधान की भावना के विपरीत है, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक प्रगति को भी बाधित करती है। जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़ता, तब तक विकास अधूरा ही माना जाएगा।

आज आवश्यकता किसी वर्ग के प्रति कटुता या दोषारोपण की नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक चेतना के निर्माण की है जो समानता, शिक्षा, भाईचारे और मानवीय संवेदना को सर्वोच्च मूल्य माने। प्रतिभा का मूल्यांकन जन्म, जाति, धर्म, भाषा या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि परिश्रम, चरित्र और योग्यता से होना चाहिए। यही भारतीय संविधान की आत्मा है और यही राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त मार्ग भी है।

आज जब भारत विश्व मंच पर एक नई पहचान बना रहा है, तब यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास का प्रकाश समाज के प्रत्येक घर तक पहुँचे। किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके शिक्षित, जागरूक और संवेदनशील नागरिक होते हैं। इसलिए शिक्षा, सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा को केवल नीतियों और भाषणों तक सीमित न रखकर जनजीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान, सुरक्षा और अवसर के साथ आगे बढ़ेगा, तभी संविधान की भावना वास्तविक अर्थों में साकार होगी।

आइए, हम ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें जहाँ शिक्षा पर किसी प्रकार का पहरा न हो, अवसर किसी विशेष वर्ग तक सीमित न हों, और हर बच्चा बिना भय, बिना भेदभाव और बिना किसी सामाजिक बाधा के अपने सपनों को साकार कर सके। यही एक समरस, न्यायपूर्ण, शिक्षित और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है। इतिहास उन्हीं समाजों को महान कहता है जो अपने सबसे कमजोर नागरिक का हाथ थामकर उसे आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। यही हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा सबसे बड़ा दायित्व भी।

इस दिशा में सरकार, प्रशासन, न्यायपालिका, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों, मीडिया और प्रत्येक जागरूक नागरिक की भूमिका समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा तक समान पहुँच, सुरक्षित सामाजिक वातावरण, निष्पक्ष अवसर और संवेदनशील प्रशासन केवल नीतिगत विषय नहीं हैं, बल्कि एक सशक्त लोकतंत्र की मूल आवश्यकताएँ हैं। जब समाज का प्रत्येक वर्ग विश्वास के साथ आगे बढ़ेगा, तभी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की नींव और अधिक मजबूत होगी। हमारा लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए जहाँ किसी बच्चे के सपनों की सीमा उसकी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और परिश्रम तय करें। यही संविधान के आदर्शों का वास्तविक सम्मान होगा और यही विकसित, न्यायपूर्ण तथा मानवीय भारत की सबसे सशक्त पहचान बनेगी।

— डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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