परचा लीक
किसी भी परीक्षा का परचा लीक होना बिल्कुल भी ठीक नहीं है, इसलिए नहीं कि परीक्षा के लिए विद्यार्थी/अभ्यर्थी जी तोड़ परिश्रम करते हैं, या अभिभावकों के लिए भी तमाम चुनौतियां भी होती है। इसके अलावा प्रशासनिक स्तर पर दुबारा परीक्षा कराने में व्यापक बदलाव, व्यवस्था तो करना ही पड़ता है,बड़े पैमाने पर धन का अपव्यय भी होता है। तमाम लोगों की पात्रता उम्र निकल जाने का दंश उन्हें जीवन भर कचोटने वाला साबित होता है।इन सब के बाद हम समय को नहीं भूल सकते। कितने लोगों का लाखों घंटे बर्बाद हो जाते हैं।परचा लीक का समाचार मिलता है। अभिभावकों, विद्यार्थियों ,अभ्यर्थियों के साथ शासन प्रशासन की मनोदशा प्रभावित होना अस्वाभाविक नहीं है।
इसके लिए सबसे पहले तो कुछ धन पशुओं और लालची लोगों की मानसिकता को दोषी देना गलत नहीं है। जिसमें कुछेक विद्यार्थियों, अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों की भूमिका को नकारना भारी भूल होगी। उसके बाद जिम्मेदारों की भूमिका होती है, जो व्यवस्था पर नियंत्रण रखने में लापरवाही दिखाते हैं, इतने पेपर लीक के बाद भी तंत्र की कमी में अपेक्षित सुधार, बदलाव न होने के कारण ऐसी संभावनाएं हमें, आपको व्यवस्था को आइना दिखाती रहती हैं। मगर सब मुँह मोड़ें मजे कर रहे हैं।
कारणों पर ज्यादा चर्चा करना व्यर्थ है, क्योंकि निष्पक्ष कुछ भी नहीं रहा, अविश्वास का बीज लगातार पुष्पित, पल्लवित होती ही जा रही है।
इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाए जाने की जरूरत है। पर्चा लीक होने की दशा में अभ्यर्थियों की फीस और और यात्रा व्यय वापस कराया जाय। और परीक्षा संपन्न कराने में व्यय राशि मंत्री से संतरी तक जो भी जिम्मेदार हैं, से वसूला जाय। जिम्मेदार शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी को पदमुक्त किया जाय, संबंधित मंत्री को हटाया जाए।
इतना ही नहीं दोषी पर देशद्रोह का मुकदमा पंजीकृत कराया जाय। उसे समस्त लोकतांत्रिक अधिकारों, सुविधाओं से वंचित किया जाय। उसकी चल-अचल संपत्ति जब्त की जाए।
जब तक कठोर कदम और कड़े फैसले नहीं लिए जाएंगे, पेपर लीक नहीं रुकेगा। पारदर्शी व्यवस्था के लिए पारदर्शिता से कदम भी उठाने होंगे। इसकी टोपी इसके सिर पर डालने से कुछ हला भला नहीं होने वाला।
शासन/प्रशासन स्तर पर यदि पर्चा लीक के प्रति गंभीरता से मनन, चिंतन किया जाय, तो ही इससे बचा जा सकता है। अन्यथा हमाम में सब नंगे हैं और उन्हें शर्म तो शायद इस लोक में आने से रही। जो रोता है रोता रहे, मरता है, मरता रहे मेरी बला से।
होते पेपर लीक की, बस चर्चा है आम।
पर ये कैसे रुक सके, होता है कब काम।।
होता है कब काम, सभी की है लाचारी।
जिसका नहीं इलाज, आज ऐसी बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, रहेंगे कब तक सोते।
आये दिन का काम, लीक अब पेपर होते।।
