कोयंबटूर मॉडल : जंगल, इंसान और भविष्य के बीच संतुलन की तलाश
जब जंगल अपनी खामोशी खोने लगें, तो समझना चाहिए कि प्रकृति और विकास का संतुलन बिगड़ चुका है। भारत आज इसी संकट से जूझ रहा है। सिमटते जंगल, बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और विकास परियोजनाएँ वन्यजीवों के पारंपरिक मार्ग बाधित कर रही हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है। तमिलनाडु इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ 2015 से जुलाई 2025 तक वन्यजीवों के हमलों में 685 लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें 522 हाथियों के हमलों से हुईं। कोयंबटूर, नीलगिरि और पश्चिमी घाट इस संघर्ष के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। समाधान की दिशा में डब्ल्यूआईआई और सलीम अली सेंटर फ़ॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नैचुरल हिस्ट्री (साकॉन) के सहयोग से कोयंबटूर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट स्थापित किया गया है। अब देखना है कि यह पहल संघर्ष घटाएगी या अन्य योजनाओं की तरह सरकारी अभिलेखों तक सिमट जाएगी।
यह संकट केवल आँकड़ों का नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों का है जिनके लिए हर रात भय लेकर आती है। हाथी फसलें उजाड़ते हैं, तेंदुए पालतू पशुओं का शिकार करते हैं और जंगली सूअर किसानों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं। भय अब जंगलों से निकलकर ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन चुका है। बच्चों का स्कूल जाना, किसानों का खेतों तक पहुँचना और महिलाओं का शाम बाद घर से निकलना प्रभावित है। कोयंबटूर मानव-हाथी संघर्ष का सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक आवासों का विनाश, अनियंत्रित विकास, वन गलियारों का टूटना और एल-नीनो से बढ़ा सूखा वन्यजीवों को बस्तियों की ओर धकेल रहा है। यहीं से उस संघर्ष की शुरुआत होती है, जिसकी कीमत अंततः मनुष्य और वन्यजीव—दोनों चुकाते हैं।
संघर्ष का स्थायी समाधान केवल रोकथाम नहीं, दूरदृष्टि में है। कोयंबटूर मॉडल इसी सोच पर आधारित है। यह केवल बाड़ या वन्यजीवों को जंगल लौटाने तक सीमित नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक और स्थानीय अनुभव का समन्वय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चेतावनी प्रणाली, थर्मल इमेजिंग, हॉटस्पॉट मैपिंग, वन्यजीव व्यवहार अध्ययन और प्राकृतिक आवासों का पुनर्स्थापन इसके प्रमुख आधार हैं। उद्देश्य राहत नहीं, बल्कि खतरे का पूर्व आकलन कर उसे टालना है। इसके लिए स्थानीय समुदायों का प्रशिक्षण, ग्राम स्तरीय सूचना तंत्र और वैकल्पिक आजीविका को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संघर्ष को वन विभाग नहीं, बल्कि समाज, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों की साझा जिम्मेदारी मानता है। सफल होने पर यह मॉडल भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा बदल सकता है।
किसी भी नीति की असली कसौटी उसकी घोषणा नहीं, प्रभावी क्रियान्वयन है। कोयंबटूर मॉडल की सबसे कठिन परीक्षा भी यही है। वर्षों से अपनाई जा रही ट्रांसलोकेशन नीति सीमित परिणाम देती रही है, क्योंकि हाथी स्मृति के आधार पर पुराने मार्गों पर लौट आते हैं। वन रक्षकों की कमी, आधुनिक संसाधनों का अभाव और जलवायु परिवर्तन से भोजन-पानी के घटते स्रोत भी बड़ी चुनौतियाँ हैं। यदि प्राकृतिक आवासों का संरक्षण और विकास परियोजनाओं पर पर्यावरणीय अनुशासन सुनिश्चित नहीं हुआ, तो केवल तकनीक स्थायी समाधान नहीं दे सकती। अंततः प्रश्न यही है—क्या हम समस्या की जड़ तक पहुँचेंगे, या केवल उसके लक्षणों का उपचार करते रहेंगे?
संरक्षण तभी सफल होता है, जब समाज की भागीदारी शासन जितनी ही मजबूत हो। कोयंबटूर मॉडल की सबसे बड़ी ताकत भी यही है। यह संघर्ष को केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती मानता है। इसलिए जैविक फेंसिंग, बेहतर फसल बीमा, त्वरित व पारदर्शी मुआवजा, पर्यावरण शिक्षा, ग्राम जागरूकता, स्थानीय युवाओं का प्रशिक्षण और इको-टूरिज्म को समान महत्व दिया गया है। उद्देश्य वन्यजीवों को बस्तियों से दूर रखने के साथ ग्रामीणों को समाधान का सहभागी बनाना है। समय पर मुआवजा, युवाओं का सहयोग और बच्चों में सह-अस्तित्व की समझ संरक्षण को जनआंदोलन बना सकती है। यही दृष्टि इसे परंपरागत योजनाओं से अलग बनाती है।
तकनीक समाधान का साधन है, विकल्प नहीं। इसलिए यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि नई योजनाएँ और आधुनिक तकनीक दशकों पुरानी समस्या समाप्त कर देंगी। यदि जंगलों का क्षरण जारी रहा, हाथियों के पारंपरिक गलियारों पर सड़कें, रेल लाइनें और अनियोजित निर्माण बढ़ते रहे तथा विकास में पारिस्थितिकी उपेक्षित रही, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी प्रकृति का असंतुलन नहीं रोक सकेगी। वैश्विक अनुभव बताता है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष वहीं घटा, जहाँ प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहे, वन गलियारे पुनर्जीवित हुए और स्थानीय समुदाय संरक्षण के साझेदार बने। इसलिए कोयंबटूर मॉडल की सफलता तकनीक नहीं, बल्कि प्राकृतिक आवासों के संरक्षण, वैज्ञानिक योजना और संतुलित विकास पर निर्भर करेगी।
किसी भी संरक्षण मॉडल की सफलता योजनाओं से नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक संकल्प और सतत क्रियान्वयन से तय होती है। प्रशासनिक तत्परता तभी सार्थक है, जब योजनाओं को निरंतर वित्तीय सहयोग, नियमित निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही मिले; अन्यथा वे कागज़ों तक सिमट जाती हैं। यदि कोयंबटूर मॉडल भी ऐसा ही हुआ, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष और गहराएगा। लेकिन वैज्ञानिक संस्थानों, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीण समाज के सतत संवाद, निष्पक्ष मूल्यांकन व समयानुकूल सुधार से यही मॉडल अन्य संघर्षग्रस्त राज्यों के लिए दिशा-सूचक बन सकता है। तब यह केवल तमिलनाडु नहीं, बल्कि भारत की संरक्षण नीति का नया मानक होगा।
प्रश्न हाथी, तेंदुए या जंगली सूअर का नहीं, हमारी विकास-दृष्टि का है। प्रकृति कभी मनुष्य की शत्रु नहीं रही; उसने उतना ही प्रतिरोध किया, जितना हमने उसका संतुलन बिगाड़ा। कोयंबटूर मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह संघर्ष की जड़ों पर काम करता है। यदि यह वैज्ञानिक सोच, प्राकृतिक आवास संरक्षण, सतत विकास, सामाजिक भागीदारी और मानवीय संवेदनाओं को जोड़ सका, तो भारत के लिए गेम-चेंजर बन सकता है। लेकिन यदि यह भी घोषणाओं और फाइलों तक सिमटा, तो मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी बढ़ेगी। अब निर्णय हमें करना है—संघर्ष की विरासत छोड़नी है या सह-अस्तित्व की संस्कृति अपनानी है। यही कोयंबटूर मॉडल और भारत की पर्यावरणीय दूरदृष्टि की असली परीक्षा है।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
