आस्था का वह स्पर्श
कहा जाता है कि विश्वास दिखाई नहीं देता, केवल महसूस होता है। आस्था का भी यही स्वभाव है। वह तर्क की चौखट पर खड़ी होकर स्वयं को सिद्ध नहीं करती, बल्कि हृदय में उतरकर अपना अस्तित्व जगा देती है। इसलिए किसी की आस्था पर प्रश्न उठाने से पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि हर विश्वास के पीछे अनुभवों का एक पूरा जीवन छिपा होता है।भारत की सबसे सुंदर पहचान उसकी विविधता है। यहाँ पूजा की विधियाँ अलग हैं, प्रार्थनाओं की भाषाएँ अलग हैं, ईश्वर को पुकारने के नाम अलग हैं; फिर भी सबका उद्देश्य एक ही है—मन को शांति मिले, जीवन को संबल मिले और मानवता बनी रहे। इसलिए किसी की आस्था या धर्म पर कटाक्ष करना न केवल अनुचित है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के भी विपरीत है।
मुझे अपना बचपन आज भी बहुत स्पष्ट याद है। जब भी मैं बीमार पड़ती—कभी तेज़ बुखार, कभी सर्दी, कभी खाँसी—तब दवाइयों से पहले एक दृश्य अवश्य दोहराया जाता था। मेरे पिताजी मेरे सिरहाने बैठते। उनके चेहरे पर न घबराहट होती, न अधीरता। वे धीरे से अपनी आँखें मूँदते, मेरे ललाट पर अपना स्नेहिल हाथ रखते और अत्यंत शांत स्वर में गायत्री मंत्र का जप करने लगते— “ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥”
उन क्षणों में मैं मंत्र का अर्थ नहीं जानती थी, पर उसके प्रभाव को पूरे मन से महसूस करती थी। ऐसा लगता था जैसे पिताजी की हथेली के स्पर्श के साथ मेरा सारा ताप, सारी पीड़ा और सारी बेचैनी धीरे-धीरे मुझसे दूर चली जा रही है। लगता था जैसे किसी ने आश्वस्त कर दिया हो—”सब ठीक हो जाएगा।”
आज सोचती हूँ तो समझ आता है कि शायद वह केवल मंत्र नहीं था उस मंत्र पर पिता का विश्वास था, उनका प्रेम था, उनका आशीर्वाद था, जो मेरे मन में साहस भर देता था। विज्ञान अपने स्थान पर है, चिकित्सा अपने स्थान पर है, और आस्था अपने स्थान पर। एक-दूसरे का विरोध किए बिना भी ये साथ चल सकते हैं।
इसलिए जब कोई किसी की श्रद्धा का उपहास करता है, तो लगता है जैसे वह केवल एक विचार नहीं, बल्कि किसी की सबसे कोमल स्मृतियों का भी अनादर कर रहा हो। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे कुछ पल होते हैं जो तर्क से नहीं, विश्वास से जुड़े होते हैं। उन पर निर्णय सुनाने का अधिकार किसी को नहीं है।
मेरी आस्था मेरी है, आपकी आस्था आपकी। हमें एक-दूसरे को बदलने की नहीं, एक-दूसरे का सम्मान करने की आवश्यकता है। क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने धर्म को छोड़ना नहीं, बल्कि दूसरे के धर्म और विश्वास को भी उसी सम्मान से स्वीकार करना है, जिसकी अपेक्षा हम स्वयं अपने लिए करते हैं।
किसी की श्रद्धा को ठेस पहुँचाकर कोई कभी बड़ा नहीं बनता। बड़ा वही बनता है, जो मतभेदों के बीच भी सम्मान बनाए रखे। अंततः आस्था का वास्तविक अर्थ यही है—मन में विश्वास हो, व्यवहार में विनम्रता हो और हृदय में सबके लिए आदर हो। आस्था का सम्मान करना किसी धर्म का नहीं, बल्कि मानवता का सबसे सुंदर संस्कार है।
— सविता सिंह मीरा
