प्रथम प्रणय की पहली बारिश
आज सुबह से ही दिल बड़ी जोर से धड़क रहा था ना जाने क्यों ? रह रह कर तुम्हारा चेहरा मेरी नजरों के सामने आ जाता था| और मेरे हाथ तेजी से घर का काम पूरा करने में लगे हुए थे| ऐसा महसूस हो रहा था | ना जाने किस पल तुम आ जाओ फिर जब मैं दरवाजा खोलनेजाऊं तो मेरी अस्त-व्यस्त दशा में, मेरी कोई बात तुम्हें बुरी ना लग जाए, और तुम कहीं मुझसे नाराज हो गए तो ?नहीं नहीं बिल्कुल नहीं, तुम्हें नाराज नहीं करना है |बचपन से जिस चेहरे की तलाश थी मुझे आज इस मोड़ पर तो सामने आया है |फिर उसकी नाराजगी ना ना तुम्हारी नाराजगी की कल्पना से ही मेरा दिल कांप जाता है| मैं तुम्हें अपने से नाराज तो कभी देख हीनहीं सकती| तुम अगर मुझसे रूठ गए तो मैं क्या तुम्हें मना पाऊंगी? इसलिए मैं तो तुम्हारे नाराज होने की बात भी ख्यालों में कभी नहीं लाती |क्या करूं मन है कि वही सोचता है जो उसके रोम रोम में बस जाए|
आज सुबह जब चार बजे उठी तो मन पढ़ने में भी नहीं लगा, किताब के हर पेज पर तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा झांकने लगताथा, ऐसा लगता था तुम अभी अभी बोलने ही वाले हो हेलो! कैसी हो ?और फिर वही दिल का जोर से धड़क उठना| एक अजीब सी घबराहट हावी हो जाती थी| जब तुम मुझे देखते थे ऐसा लगता था मैं किसी मोम की भांति पिघल रही हूँ|सच !क्या इसी को प्रेम कहते हैं?नहीं नहीं शायद नहीं, लेकिन फिर मैं क्या करूं? कैसे सामना कर उन पलों का जब तुम मेरे सामने हो और मुझे कुछ कहना हो|
अचानक तेज गंध सीआई ओ- भगवान ,यह तो जलने की बू है मैं तेजी से किचन की तरफ दौड़ी चाय का पतीला पूरा काला पड़ चुका था| और उसमें से धुँआ निकल रहा था, याद आया मैंने चाय रखी थी बनने को पर तुम्हारे ख्याल ,सच हर कहीं सामने आ जाते हैं|
जुलाई का महीना था, लगता है रात में तेज बारिश हुई है मैंने सोचा छत पर थोड़ी देर टहल लिया जाए| फिर कुछ समय बाद फ्रेश मूड से पढ़ने की कोशिश की जाए, यह सोचकर मैं छत पर चली गई, पूरी छत पर मेरे अलावा कोई नहीं था पूरा अपार्टमेंट नींद की आगोश में था| ये सब जल्दी क्यों नहीं उठ जाते ?फिर याद आया रविवार था संडे को देर से बिस्तर छोड़ ना पसंद करते हैं लोग| अपार्टमेंट के पीछे दूर तक घने वृक्षों की कतारें तथा हरियाली थी |बारिश की बूंदे वृक्षों के पत्तों पर ठहरी हुई थी, किसी वृक्ष पर नहीं नहीं रंगीन जंगली चिड़िया बैठी थी| तो कहीं किसी वृक्ष की डाली पर कोई तोता चुपचाप बैठा था|मानो प्रकृति के इस सुंदर रूप का मन ही मन आनंद ले रहा हो| पक्षी कितना अधिक प्रकृति के नजदीक होते हैं |हवाओं की ठंडक,हम मनुष्य तो बस एहसास करते हैं | पक्षी तो ठंडी हवाओं के मध्य से गुजर कर उसे अपने अंतर में उतार लेते हैं| कितना सुकून मिलता होगा उन्हें प्रकृति की गोद में|
सुकून मुझे कब मिला था?वहां दूर घने वृक्षों की शाखों के पीछे से ऐसा लगा, तुम्हारा चेहरा मुस्कुराया हो धीरे से| मुझे देख कर तुम वापस उसी वृक्ष की घनी शाखो के पीछे छुप गए हो| हरियाली और खामोश पेड़ों की गहरी चुप्पी ऐसी लग रही थी कि कोई मुनि,साधु गहरे ध्यान में खोया हुआ हो| कभी-कभी खामोश हो रह कर भी खामोशी को कहीं भीतर तक उतारना अपने आप में एक अलग ही सुकून देता है| जिससे कि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता| तभी हल्की सी फुहार शुरू हो गई धीमी धीमी, मैंने सामने घने वृक्ष पर बैठे तोते को देखा तो पाया उसे रिमझिम फुहार से कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था |वह वैसे ही तटस्थ बैठा था या फिर भीगने का आनंद उठा रहा था| तोता बेहद स्वस्थ व चमकीला था, मन कर रहा था उस तोते को पकड़कर उसके शरीर पर से वर्षा की बूंदों को साफ करके भी मैं से उसे चूम लू| पर ऐसा नहीं हो पाएगा हमारे बीच बहुत फासला है |वृक्ष दूर भी है,ऊँचा घना भी| सिर्फ ख्याल था खूबसूरत सा|
मुझे याद आयी तीन दिन पहले कॉलेज की वह शाम जब इन्ही रिमझिम फुहारों ने मुझे रोक लिया था| सुबह से ही तेज धूप और खुले मौसम के कारण में छतरी लेकर कॉलेज नहीं गयी| लेकिन दोपहर के बाद से ही आसमान पर बादलों का सांवलापन अधिक गहराने लगा | था |मेरा हिंदी का पीरियड खत्म होते-होते बूंदाबांदी शुरू हो गयी| मैं अन्य गर्ल्स के साथ लाइब्रेरी के बाहर ही खड़ी हो गयी| क्योंकि लाइब्रेरी का दरवाजा सड़क पर ही खुलता था| जहाँसे कोई दिख जाए तो घर पहुँचूँ| इतने में तुम कार पार्किंग से अपनी कार निकालते हुए दिखे,अचानक कार को मोड़ते हुए तुम्हारी आँखों से मेरी आँखे टकराई तुमने लाइब्रेरी तक आते-आते कार धीमी की| मुझे देख कर गहरी मुस्कान तुम्हारे होठों पर आयी,बोले” प्रीत आओ तुम्हें घर छोड़ दूंगा” मैं यंत्र चालित सीआई तुम कार का दरवाजा खोल चुके थे, मैंने दरवाजा बंद किया लेकिन ठीक से वह बंद नहीं हुआ था, शायद, तुमने थोड़ा नजदीक आकर दरवाजे को ठीक से लॉक किया उतने ही पल में तुम्हारा करीब आकर दरवाजा लॉक करना वह हल्का सा स्पर्श वह भीनी भीनी सी खुशबू मेरे अंतर में उतर गई थी|कार धीमे-धीमे सड़क पर चलने लगी बारिश होने से तुम धीमे ड्राइव कर रहे थे वाइपर अपने काम में लगे थे|
प्रीत क्या सोच रही हो ?पराग ने सड़क पर देखते हुए कहा मैंने उसकी ड्राइविंग का फायदा उठाया कई बार उसे मैंने चोर नजरों से देखा क्या पता क्या था उसके चेहरे में मन था कि बंधा रह गया, अनजानी डोर से,आँखे थी कि उसकी मुस्कान को देखना चाहती थी| थक जाने की हद तक, लेकिन ना हो सका अजीब सा लगेगा उसे सोचेगा कैसी लड़की है? क्या वह भी ऐसा सोचता है ?पसंद करता है जितना कि मैं पता नहीं ?बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी |
प्रीत कॉफी पीयोगी? पराग की नजरें अब भी सड़क पर थी प्रीत की नजरें पराग के चेहरे पर, विवश होकर नजरें हटानी पड़ी मैंने तुमसे पूछा है कहां हो तुम? पराग का स्वर इस बार थोड़ा ऊँचा था|
कहीं नहीं बोलो क्या ?कॉफी? नहीं पराग देर हो जाएगी मैंने अचानक हड़बड़ा कर कहा
छोड़ो भी यार,नहीं होगी देर मैं कॉफी हाउस गाड़ी मोड़ रहा हूँ,
मैं कुछ कहती ,तब तक पराग गाड़ी जावरा कंपाउंड से रीगल टॉकीज की ओर मोड़ चुका था| क्या फिल्म दिखाने ले जा रहे हो मैंने थोड़ा हल्के मूड में कहा,
नहीं मुझे फिल्म देखना वैसे भी पसंद नहीं तीन घंटे एक ही जगह पर, ना बाबा ना मैं नहीं बैठ सकता |इतनी देर, पराग ने कहा फिर हम कहां जा रहे हैं मैंने पूछा हम इंदौर कॉफी हाउस जा रहे हैं समझी, इन्दोर कॉफी हाउस एमजी रोड पर पड़ता है, यह पता था मुझे, पराग ने गाड़ी पार्क की फिर करीब आकर बोला अब उतरो भी ,
पराग बारिश में भीग जाएंगे, चलो अब नखरे छोड़ो सामने दो कदम की दूरी तक चलना है समझी|
पराग जब “समझी” कहता था तब बड़ा अच्छा लगता था |खैर जब हम अंदर पहुंचे तो दो-तीन टेबल को छोड़कर पूरा कॉफी हाउस खाली था|पराग ने कोने की एक टेबल पर कब्जा जमाया फिर मुझसे पूछा कॉफी के साथ क्या लोगी जो तुम्हारा मन कहे ,
अब बोलो भी पराग के अंदाज में थोड़ी झुंझलाहट भरी थी और मुझे अच्छा लग रहा था |
पनीर पकोड़े चलेंगे? पराग की नजरें फिर मेरे चेहरे पर जम गई| चलेगा मैंने इससे अधिक कुछ नहीं कहा कॉफी आने तक मैं पराग के सामीप्य का पूरा पूरा आनंद उठाना चाहती थी,
प्रीत, पराग का धीमा नशीला स्वर,
हाँ कहो, मैंने कहीं डूबते हुए जवाब दिया,
कुछ नहीं कह कर पराग मुस्कुरा दिया कॉफी हाउस में हल्का गुलाबी प्रकाश फैला हुआ था, कितनी जानलेवा मुस्कान है कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही ज्यादा सोचती हूँ ,पराग के बारे में शायद,
वेटर कॉफी के साथ पनीर पकोड़े रखकर जा चुका था |कॉफी की धीरे-धीरे उठती भाप हम दोनों के चेहरे के मध्य किसी चिलमन सा काम कर रही थी| तभी पराग ने पनीर का एक पकोड़ा उठाया धीरे से मेरे होठों की तरफ बढ़ाया मैंने शायद एक पल ही सोचा होगा फिर होंठ खोल दिए, लेकिन यह क्या, सिर्फ आधा ही पकौड़ा खिलाकर शेष बचा पकोड़ा पराग ने खुद खा लिया |उसका वह अंदाज गहरे तक उतर गया|
जब हम कॉफी हाउस के बाहर निकले तब तक बारिश हल्की हो चुकी थी घर पहुंचने तक हम दोनों ही चुप थे| कार से उतरते समय पराग ने प्रश्न किया “प्रीत अब कब मिलोगी ?
मैं कुछ बोल नहीं पायी,
अच्छा ठीक है मैं इस संडे को घर आता हूं बाय-बाय| देखते ही देखते पराग की गाड़ी धीरे धीरे नजरों से ओझल होती चली गयी| अचानक तेज आवाज में कोई जंगली चिड़िया मेरे पास से गुजर गई मैं ख्यालों के भंवर से वापस आ गयी|तेजी से सीढ़ियां उतरती हुई घर आ गई|
अभी सब सोए हुए थे, चलते हैं थोड़ी पढ़ाई कर लेते हैं, यह सोच कर थीसिसपर कुछ कार्य करने का सोचा एक पेज पलटा हीथा, फिर तुम्हारा चेहरा |सोचा तुम्हें फोन कर लूं, मोबाइल उठाया जैसे ही मोबाइल पर तुम्हारा नंबर आया बहुत देर तक मैं तुम्हारे नाम के साथ वह नंबर देखती रही लेकिन कॉल करने का साहस नहीं हुआ|
सच जो हमें प्रिय होता है उसकी छोटी-छोटी बात भी हमें बेहद पसंद आती है चाहे वह उसका मोबाइल नंबर ही क्यों ना हो, देर तक उस नंबर को भी नहीं निहारना कितना अच्छा लगता है ना जाने कितनी देर तक मोबाइल पर पराग का नाम देखती रही, इतने में दरवाजा जोर-जोर से बजाया जाने लगा मेरे दिल की धड़कन एकदम से तेज हो गई और घबराहट के मारे मोबाइल फर्श पर ,एकदम से दौड़कर दरवाजा खोला देखा तो कामवाली बाई थी| मेरी धड़कन ए सामान्य हुई|
सारा दिन मुझे चैन नहीं आया हर आहट पर दिल तेजी से धड़कने लगता और मैं पसीने से नहा उठती| ना जाने कितनी बार उसका नाम हथेली पर लिख लिख कर मिटाया कभी धीरे से उस नाम को होठों से स्पर्श किया पर इंतजार के पल लंबे होते चले गए| पराग नहीं आया मन में आया फोन करके आने का समय पूछ लूं लेकिन साहस नहीं हुआ|
दोपहर के लगभग दो बजे जब खाना खाकर अपने कमरे में गई तब भी मन अशांत था, कब आएगा पराग समय क्यों नहीं बताया ?थोड़ी देर कर लेते हैं इंतजार, शायद शाम को आए,आँखों मे नींद का पता भी दूर दूर तक नहीं था| अजीब सी बेचैनी मेरे पूरे दिलो दिमाग पर छाई थी मुझे पूछना था उससे कि वह कब आएगा ?हो सकता है उसने यूँ ही कह दिया हो |नहीं यूँ ही वह कैसे कह सकता है ?मजाक है क्या?
थोड़ी देर टीवी ही देख लिया जाए शायद समय बीत जाए सोचकर टीवी ऑन किया तो फिल्म मंजिल का गीत दिखाया जा रहा था,
रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन”
फिर वही बारिश मेरे ख्यालों में, पार्किंग से कॉफी हाउस तक हल्की बारिश के साथ साथ भीगते हुए जाने के चित्र उभरने लगे, पराग का साथ कितना सुरक्षित लगता है, कितना सुकून भरा|
, ना जाने कब आएगा, अरे चेहरा तो ठीक से संवारा नहीं एक बार ठीक से फ्रेश हो जाँऊ? नहीं तो सुस्ती बिखरी रहेगी चेहरे पर ना जाने क्या सोचेगा? यही सोचकर वाशबेसिन पर जाकर ठंडे पानी से चेहरा धोया, तो हल्का सा महसूस हुआ |उदासी चेहरे पर छाई बेचैनी को साफ बता रहा था| आंखों में अजीब सा खोयपन तैर रहा था| दर्पण में एक दूसरी ही प्रीत का अक्स था|
मुझे लगता है चेहरे पर आँखे, होंठ विशेष होते हैं इन्हें अधिक खूबसूरत होना चाहिए, आंखें तो मेरे पास खूबसूरत है, कुल मिलाकर मुस्कुराहट की तारीफ भी अक्सर गर्ल्स करती है| लंबाई भी अच्छी है, रंग गोरा नहीं साफ कहा जाता जा सकता है| बालों को खुला रखूं या रंगीन स्कार्फ में बांध कर रखूं|
इतने में कॉल बेल की तेज आवाज ने मेरी दिल की धड़कनों को एकदम से बढ़ा दिया| पूरा शरीर एकदम से काँप उठा, कपोल एकदम से गर्म हो उठे थे| मैं लगभग भागती हुई दरवाजे के पास पहुंची एक पल सोच कर मैंने एकदम से दरवाजा खोल दिया दरवाजे पर धोबन खड़ी थी| प्रेस के लिए कपड़े लेने को| उसे देखते ही मेरा इंतजार एक तीखे गुस्से में बदल गया, मैंने कठोरता से कहा यह कोई समय है कपड़े मांगने का ?
मेमसाब दोपहरी के बाद ही तो हम आते हैं कपड़े लेने को ,आप देख ले कितना बजा है? मैंने तुरंत घड़ी की तरफ नजर डाली शाम के 5:00 बज चुके थे| ओह- शाम हो चुकी है| तब तक मेरे इंतजार की घड़ियां चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी| मैंने बुझे मन से धुले हुए कपड़े निकाले और धोबन को प्रेस के लिए दे दिए|
दरवाजा बंद करके जब अपने कमरे में आई ऐसा लगा कि इंतजार की जगह गुस्से ने ले ली है मैंने क्यों नहीं पूछा कि वह कब आएगा? काश !मैंने पूछा होता यह इंतजार, हर आहट पर इतनी बेचैनी, घबराहट क्या करूं? मैं ,ना वोआया ना फोन किया, फिर कब आएगा? हर दस्तक मेरा दिल धड़का देती है, हर आहट पर मैं घबरा जाती हूँ, और किस बात पर मैं इतनी बेचैन हूँ, और मैं फूट-फूट कर रो पड़ी, तकिया मेरी तन्हाई में बहाए आँसुओं का गवाह बन गया, रोते-रोते ना जाने कब मेरी आंख लग गई| पर उस संडे को पराग नहीं आया, तो नहीं आया, सोमवार को भी मेरा कॉलेज जाने का मन बिल्कुल नहीं कर रहा था, फिर वही कल का जानलेवा और मीठा कसक भरा इंतजार नजरों के सामने घूम गया| गुस्सा भी इतना आ रहा था अपने आप पर कि मन कर रहा था कि मैं उससे कभी बात नहीं करूं|पर जब वह दो-चार दिन बाद अपनी कार लेकर कॉलेज के गेट पर मिला जाता है ,तो भूल जाती हूं पुरानी शिकायतें ,आज कॉलेज नहीं जाऊंगी करने दो जनाब को इंतजार |कुछ दिन इंतजार, एक-एक पल को धीरे-धीरे जाते हुए देखना फिर भी खबर नहीं आना ,फोन नहीं आना मेसेज नही करना|कम से कम पंद्रह दिनों तक कोई बात नहीं करूंगी| ना ही फोन करूंगी ना ही किसी प्रकार का मेसेज|. मित्रता की कोई पहचान नहीं? दोस्तों के साथ भी ऐसा सलूक? आश्चर्य है ?
सुबह के सात बजने को थे, मम्मी ने अभी-अभी चाय टेबल पर रखी थी, चाय का कप लेकर मैं बालकनी में आ गई ,मौसम में हल्की ठंडक घुली हुई थी |लगता है सारी रात बारिश होती रही थी| पेड़ों की ताजगी देखते ही बनती थी, अभी फिलहाल बारिश बंद थी ,पर नन्ही नन्ही फुहारे रुक रुक कर जारी थी| बादल ऐसे लग रहे थे मानो पेड़ों के शिखर पर पसर गए हो |रात भर बरसने के बाद थक कर आराम कर रहे हो फिंजा में नमी थी| इस नमी ने भी उस वातावरण को रोमांटिक बना दिया था| मौसम बेहद खुशनुमा था |ऐसे में पराग का यह व्यवहार बड़ा तकलीफ देता है |वह क्यों नहीं समझता ,इन गुलाबी बातों को ,गुलाब की खुशबू में पके हुए ख्यालों को, कैसा कठोर दिल है पराग का? उसके दिल में क्या यह सब बातें नहीं आती ?किस बात का घमंड है? उसे दौलत का? अपनी स्मार्टनेस का? पता नहीं किस बात पर इतनी अकड़ दिखाता है ?अब जब भी मिलेगा तो जरूर पूछूंगी ऐसा व्यवहार वह करता क्यों है?
आज तो मूड खराब होने से नींद भी देर से खुली मॉर्निंग वॉक पर भी नहीं जा पाई, पता नहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं ,जिन्हें दूसरों के दुख से सुखी होने की आदत होती है| पराग शायद उन्हीं में से हो? लगता तो नहीं, फिर कहा क्या जा सकता है ?उसके अंतर में क्या छुपा है? भगवान जाने मुझे सोचना था पराग से दोस्ती से पहले |लेकिन विचारों की समानता ही हमारी दोस्ती का आधार बन गई थी|
मन कर रहा था पराग के साथ कहीं दूर इस धीमी धीमी बारिश में चलकर भीगा जाए| जंगल में कहीं ऊंची नीची पहाड़ियों के बीच,भीगेपेड़, भीगी सड़के, भीगा भीगा हर फूल ,धूली निखरी हर बात, बिल्कुल उजली सी| सुबह भी सफेद कोरे कागज सी कितनी सफेद है| लिख दूँ इस पर कोई अच्छी कविता या फिर पराग की कोई प्यारी सी ग़ज़ल | मुझे याद आया अलीपुरद्वार का झील का वह सुंदर नजारा जहाँ चमकते सफेद गोल पत्थर झील के किनारों में कितने सुंदर दिख रहे थे |बांस से बनी खूबसूरत कॉटेज, जो दिखने में दूर से किसी चित्र की भांति लग रही थी ,पर करीब देखने पर ही मालूम होता कि यह कॉटेज है ,ऐसी ही सुंदर सी कॉटेज में पराग के साथ चलकर इस बारिश का जमकर आनंद लिया जाए |लेकिन उसकी यह बात बात पर रूठनेवाली आदत परेशान कर देती है मुझे| दोस्तों में यह नखरे वाली आदत तो होनी नहीं चाहिए| क्या पता कब छोड़ेगा अपनी ये रूठने की आदत|
प्रीत आज कॉलेज नहीं जाओगी? प्रीत के कानों में मम्मी की आवाज जैसे ही पड़ी वह खयालों से बाहर आयी|
प्रीत की मम्मी अपनी बेटी के चेहरे पर छाए उतार-चढ़ाव को देख रही थी, मुलायम स्वर में बोली आज सोमवार है कॉलेज का पहला दिन जाओ तैयार हो जाओ|
नहीं मम्मी आज मूड नहीं, पराग भी परेशान करता है, कल कहा था आने को, नहीं आया मेरा मूड खराब था,
अच्छा देखो, कॉलेज में मिले तो उसे डाँट देना मम्मी बोली,
नहीं मम्मी डाँट भी सुन कर मुस्कुरा देता है, मैंने कहा|
अब तू जाने और पराग मैं चली, घर में काम भी पड़ा है| मम्मी चली गयी |
मैं भी चली जाती हूं कॉलेज लेकिन पराग से बात नहीं करूंगी सोचते सोचते मैं कॉलेज के लिए तैयार होने लगी, घर से कॉलेज की दूरी मुझे विशेष नहीं लगती थी मुझ में एक आदत है जब भी मैं पराग के संबंध में सोचना शुरु कर दी तब समय तो मानो पंख लगा कर ना जाने कहां उड़ जाता है, पता नहीं चलता घंटों कैसे गुजार जाते हैं |उसका एक ख्याल ही मुझे रातों को बेचैन किए रहता रात में दो बजे तक मैं बेचैन सी केवल आसमान में सफर करते चांद को देखती रहती, बड़ा परेशान करता है यह लड़का मुझे क्या करें ?उसकी इंतजार कराने की आदत का, मिलने दो कॉलेज में बिल्कुल बात नहीं करनी, कैसा दोस्त है? अपनी दोस्ती की परवाह नहीं करता |उसे अहसास नहीं इंतजार करने में कितनी तकलीफ होती है|
मेरा पीरियड यू भी सेकंड था, फर्स्ट पीरियड तो मुझे यूँ ही खाली रहना ही था, इसलिए विशेष जल्दी कुछ नहीं था,यही सोचते की यही सोचते-सोचते मधुमिलन टॉकीज तो निकल ही गया |कॉलेज जावरा कंपाउंड में था |पहला जो खाली पीरियड था उसे लाइब्रेरी में बिताते हैं| पिछली बार वह शिवानी की पुस्तक तलाश रही थी शायद वह मिल जाए ?यही सोच कर मैंने पर्स से लाइब्रेरी का कार्ड निकाला ही था, कि पराग की कार की झलक दिखाई दी, कुछ पलों बाद कार मेरे ठीक सामने खड़ी थी|
मैं तुमसे कभी बात नहीं करूंगी कभी नहीं कदापि नहीं |तुम परेशान करते हो, इंतजार करवाते हो समय के पाबंद बिल्कुल नहीं हो, तुमको पता है कितनी तकलीफ होती है, इंतजार करने में |बोलते बोलते मैं अपने आँसू रोक ना सकी और आँसू मेरे गालों पर बह निकले|
अरे अरे प्रीत ये क्या ?’ पराग बेहद घबरा गया, तुरंत कार का दरवाजा खोलकर नीचे उतरा मुझे कंधों से पकड़ कर तुरंत ही कार की अगली सीट पर बैठाया, तेजी से दूसरी और खुद आकर बैठ गया| कार धीरे-धीरे ड्राइव करनी शुरू कर दी, साथ ही मुझे समझाने भी लगा प्रीत आगे से ऐसा नहीं होगा, प्लीज चुप हो जाओ |
नहीं होना मुझे चुप बोलो क्या करोगे? मैं जोर से बोली
प्लीज ,प्रीत रियली वेरी सॉरी|’ पराग ने कहते कहते मुझे अपने में समेट लिया मेरे आँसू उसके कंधे को भिगोने लगे थे| बारिश शुरू हो गई थी धीमे-धीमे|
— इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’
