मुक्तक/दोहा

निकला नहीं उपाय (दोहे)

भ्रष्टाचारी संगठन, जगा आंतरिक रोष।
घटना पेपर लीक की, थोपे किसको दोष।।

सांठ-गांठ कर चोर ने, फैला दिया फसाद।
खुद का कुछ बिगड़ा नहीं, युवा हुए बर्बाद।।

स्वार्थियों ने ही किया, जमकर के खिलवाड़।
राजनीति की जो घृणित, भविष्य दिया उजाड़।।

विद्या को धंधा बना, ऐसा खेला खेल।
मासूमों को ही छला, गर्त में दे ढकेल।।

घूमें दोषी शान से, निर्दोषी को जेल।
न्याय व्यवस्था है यहॉं, मिले झूठ को बेल।।

युवा वर्ग के आज की, किसको चिंता माथ।
विपक्षियों को तो मिला, मुद्दा मौका साथ।।

दुखती रग पर हाथ दे, बिछा दिया है जाल।
दुष्टों ने ही की भ्रमित, युवा बुद्धि चल चाल।।

न्याय प्रणाली सुप्त हो, तो ये होता हाल।
आम आदमी टूटता, चोर ठोकता माल।।

जंतर-मंतर की व्यथा, आहत हुआ समाज।
युवा लड़ाई लड़ रहा, रोता-रोता आज।।

प्रश्न कई उत्तर नहीं, इतना मचा बवाल।
हल निकलेगा या नहीं, सबसे बड़ा सवाल।।

चलती इस सरकार से, कैसे हो फरियाद।
बात हाथ से ही गई, हिली नींव बुनियाद।।

क्रोध वश उठाए कदम, भड़का जन समुदाय।
तड़पे भीतर भावना, निकला नहीं उपाय।।

ऐसी उलझी जिंदगी, चलता-फिरता श्राप।
रास्ता हमको दे बता, ईश “आनंद” आप।।

क्या सच है क्या झूठ है, कलयुग का ही बंध।
करें विश्वास या नहीं, घायल हर संबंध।।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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